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Thursday, May 8, 2025

बीज बचाओ आन्दोलन (Beej Bachao Andolan)

बीज बचाओ आन्दोलन (Beej Bachao Andolan)

1. पृष्ठभूमि

1970 और 1980 के दशक में भारत में हरित क्रांति के कारण कृषि उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन इसके साथ-साथ पारंपरिक खेती, देशी बीज और जैव विविधता पर संकट गहराने लगा। हाइब्रिड बीज, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ा, जिससे किसानों की आत्मनिर्भरता कम हुई और पर्यावरणीय असंतुलन उत्पन्न हुआ।

इन्हीं समस्याओं के समाधान हेतु उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल ज़िले से एक अनूठा आन्दोलन शुरू हुआ, जिसे हम बीज बचाओ आन्दोलन के नाम से जानते हैं।


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2. शुरुआत और प्रेरणा

स्थापना: वर्ष 1986 में

स्थान: टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश)

प्रमुख व्यक्ति: विजय जार्डहरी — एक सामाजिक कार्यकर्ता और किसान

प्रेरणा स्रोत:

हरित क्रांति से पारंपरिक खेती पर आए संकट को देख कर।

देशी बीजों का लुप्त होना।

किसानों की कंपनियों पर बढ़ती निर्भरता।




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3. उद्देश्य

पारंपरिक देशी बीजों की रक्षा और संरक्षण करना।

हानिकारक रासायनिक खेती और हाइब्रिड बीजों के प्रयोग का विरोध करना।

जैविक खेती और प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देना।

किसानों को बीज के स्तर पर आत्मनिर्भर बनाना।

कृषि के सांस्कृतिक पहलू को पुनर्जीवित करना।



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4. प्रमुख गतिविधियाँ

(क) बीजों का संग्रहण और संरक्षण

पारंपरिक बीजों को गाँव-गाँव जाकर इकट्ठा किया गया।

बीजों के बीज बैंक (Seed Banks) बनाए गए।


(ख) बीज मेलों का आयोजन

विभिन्न गाँवों में बीज मेले (Seed Fairs) लगाए गए जहाँ किसान बीजों का आदान-प्रदान करते हैं।


(ग) नस्लों की पुनर्प्राप्ति

पुराने, दुर्लभ बीजों को फिर से खेतों में बोया गया।

गढ़वाल में 200 से अधिक किस्मों के पारंपरिक धान (चावल) की खेती दोबारा शुरू हुई।


(घ) प्रशिक्षण और जनजागरण

किसानों को जैविक खेती, मिश्रित खेती, और बीज संरक्षण के लिए प्रशिक्षित किया गया।



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5. आन्दोलन की विशेषताएँ

यह केवल एक कृषि आन्दोलन नहीं, संस्कृति, परंपरा और पर्यावरण की रक्षा का प्रयास है।

आंदोलन में "नवधान्य" जैसे सिद्धांतों को अपनाया गया — अर्थात नौ प्रकार के धानों की परंपरा।

यह एक जनआधारित, विकेन्द्रीकृत आन्दोलन है — जिसमें सरकार से ज्यादा जनता की भागीदारी है।



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6. आन्दोलन का प्रभाव

गढ़वाल क्षेत्र में कई परंपरागत फसलों की वापसी हुई।

किसानों की लागत घटी और आत्मनिर्भरता बढ़ी।

कई राज्यों में किसानों ने इस मॉडल को अपनाया।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।



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7. समकालीन महत्व

आज के समय में जब GMO बीज, क्लाइमेट चेंज और किसान आत्महत्या जैसे मुद्दे हैं, यह आन्दोलन और भी प्रासंगिक हो गया है।

बीज बचाओ आन्दोलन हमें सिखाता है कि स्थानीय समाधान, टिकाऊ और सांस्कृतिक रूप से जुड़ाव वाले होते हैं।



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8. चुनौतियाँ

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभाव।

सरकारी नीतियों में पारंपरिक बीजों को समर्थन की कमी।

नई पीढ़ी का खेती से दूर होना।



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निष्कर्ष

बीज बचाओ आन्दोलन केवल कृषि या बीज का मुद्दा नहीं है, यह ग्राम्य संस्कृति, पर्यावरण, किसानों की आत्मनिर्भरता और जैव विविधता की रक्षा का आंदोलन है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा भविष्य हमारी परंपराओं में छिपा है।

Wednesday, January 22, 2025

खूबसूरती रुद्रप्रयाग की::31 पर्यटन स्थल

देवभूमि उत्तराखंड असीम प्राकृतिक सौंदर्य समेटे है|  यहां गढ़वाल मंडल के अंतर्गत जनपद रुद्रप्रयाग में अनेक दर्शनीय धार्मिक ,अध्यात्मिक,प्राकृतिक तथा ऐतिहासिक स्थल हैं।यह देवस्थली है,   जहां पर प्रकृति ने अपनी सुंदरता को बड़ी खूबसूरती से बिखेरा  है। देश-विदेश से पर्यटक और श्रद्धालु आस्था के साथ  यहां सदियों से  आते हैं । आइए आपको परिचित कराते हैं रुद्रप्रयाग के कुछ ऐसे ही पर्यटन स्थलों से-
                



                  1)    रुद्रप्रयाग संगम
                         फोटो साभार-डॉo विनोद कुमार यादव

पंच प्रयागों में से एक, 610 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रुद्रप्रयाग मुख्यालय पर अलकनंदा और मंदाकिनी नदी का संगम स्थल है। रुद्रप्रयाग में रूद्रनाथ  जी का मंदिर है, इसी के नाम पर स्थान का नाम रुद्रप्रयाग है।सतोपंथ हिमनद से निकलने वाली अलकनंदा तथा चौराबाड़ी ग्लेशियर से निकलने वाली मंदाकिनी ,रुद्रप्रयाग में मिलने के बाद अलकनंदा के नाम से जानी जाती है। जो आगे भागीरथी से मिलकर दिव्य गंगा के रूप में प्रकट होती है। दोनों नदियों के संगम पर स्थित रुद्रप्रयाग प्राकृतिक छटा से भरपूर दिव्य स्थल है। 
दूरी-
रुद्रप्रयाग बस स्टेशन से 01 किलोमीटर
ऋषिकेश से 142 किलोमीटर
जॉली ग्रांट एयरपोर्ट से 159 किलोमीटर।





               2)     कोटेश्वर महादेव
                                फोटो साभार-अमित रावत
कोटश्वर महादेव रुद्रप्रयाग मुख्यालय के पास बहती अलकनंदा नदी के तट पर है।यहां पर एक प्राचीन गुफा है 
जिस में शिव जी का आपरूपी लिंग स्थित हैं।मान्यता है कि यहाँ शिवजी ने भस्मासुर से बचने के लिए भगवान विष्णु की तपस्या की थी | यह गुफा नदी तट से प्रारंभ होकर उसी पर्वत के शीर्ष पर खुलती है | कल-कल करती अलकनंदा और प्राकृतिक गुफा पर्यटकों को आकर्षित करती है।
दूरी-
रुद्रप्रयाग बस स्टेशन से। 3 किलोमीटर
रेलवे स्टेशन ऋषिकेश से 145 किलोमीटर
एयरपोर्ट जौलीग्रांट से 162 किलोमीटर।





3)                        देवरिया ताल
                               फोटो साभार  -आलोक नौटियाल 
  रुद्रप्रयाग जनपद में उखीमठ-चोपता रोड़ पर सारी गांव से 3 किलोमीटर की चढ़ाई पर यह अद्भुत ताल स्थित है। चौखंबा का प्रतिबिंब चारों ओर से घास के मैदान, घने जंगल से घिरी झील पर बिल्कुल साफ दिखाई पड़ता है। अनुपम सौंदर्य से से लबालब यह ताल बर्फबारी के मौसम में कभी -कभी बर्फ से ढक जाता है ।कृष्ण - जन्माष्टमी पर यहां  स्थानीय लोगों द्वारा देवरिया मेले का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा इस ताल में सिंघाड़े भी पैदा होते हैं।
दूरी -
रुद्रप्रयाग से 55 किलोमीटर 
ऋषिकेश से 195 किलोमीटर।






                   4)            चोपता
 
मनभावन बुग्याल और देवदार,बुराँस के सदाबहार जंगलों के बीच से चोपता, तुंगनाथ और चंद्रशिला का बेस कैंप है। विभिन्न प्रकार के पशु- पक्षियों की प्रजातियों का वास-स्थान चोपता अपनी समृद्ध जैव - विविधता के लिए प्रसिद्ध है। यह असाधारण क्षेत्र श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए अत्यंत सुगम है।
दूरी-
रुद्रप्रयाग से 50 किलोमीटर 
ऋषिकेश से 166 किलोमीटर।

                     

                    5)       तुंगनाथ
 
                                      फोटो- प्रकाश चंद्र मैठाणी 
 तुंगनाथ उत्तराखंड में सर्वाधिक ऊंचाई पर (लगभग 3680 मीटर)  स्थित शिव मन्दिर है। यह प्राचीन मंदिर पंच केदारों में से तृतीय केदार के नाम से प्रसिद्ध है। अदभुत लगभग चार किलोमीटर दूरी का पहाड़ी रास्ता मखमली बुग्यालों से बीच से होकर दिव्य मंदिर तक पहुंचता है ।चोपता तुंगनाथ मार्ग में जड़ी-बूटी शोध परिसर   है।यहाँ पर उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक), गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल का औषधीय एवं सगंध पादप अध्ययन केंद्र है ।
 दूरी -
चोपता से 3 किलोमीटर 
रुद्रप्रयाग से चोपता 50 किलोमीटर
ऋषिकेश से 144 किलोमीटर


                   6)             चंद्रशिला
 

 तुंगनाथ से 1 किलोमीटर की चढ़ाई रास्ते से होते हुए 4000 मीटर की ऊंचाई पर चंद्रशिला चोटी स्थित है। इस चोटी से हिमालय नंदा देवी, त्रिशूल, केदार, बंदरपूंछ तथा चौखंबा के अलौकिक दर्शन होते हैं। यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त के अद्भुत दृश्य देखने के लिए भारी संख्या में सैलानी आते रहते हैं।
दूरी 
चोपता से 4 किलोमीटर
ऋषिकेश से चोपता 166 किलोमीटर





                       7)   मक्कूमठ
 

मक्कूमठ में तुंगनाथ मन्दिर       फोटो-प्रेम बल्लभ  गौड़ 


 भगवान तुंगनाथ शीतकाल में मक्कूमठ में विराजमान रहते हैं । कपाट खुलने पर पैदल शोभायात्रा तुंगनाथ पहुंचती है।  लगभग आठ -नौ किलोमीटर की पैदल दूरी पर तुंगनाथ मन्दिर स्थित है। बर्फबारी तथा विभिन्न प्रकार के पक्षियों के वास के कारण यह स्थान पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। यहाँ जगपुड़ा नामक स्थान से सम्पूर्ण हिमदर्शन किया जा सकता है।
दूरी -
रुद्रप्रयाग से मक्कूमठ- 46 किलोमीटर 
ऊखीमठ से -32 किलोमीटर
भीरी से मक्कूमठ-16 किलोमीटर



                      8)        कालीमठ
 
                          फोटो साभार -राकेश चंद्र सेमवाल 
भारत के प्रसिद्ध सिद्ध पीठों में से एक कालीमठ मां काली को समर्पित मंदिर है। रुद्रशूल नामक राजा की ओर से यहां शिलालेख ब्राह्मी लिपि में स्थापित किए गए हैं। अद्वितीय लेखक कालिदास की  तपस्थली कालीमठ को कहा जाता है । यह दिव्य मन्दिर केदारनाथ मार्ग के बीच में स्थित है।
कालीमठ मंदिर के पास में एक रक्तबीज शिला स्थित है मान्यता है कि यहां पर काली माता द्वारा दैत्यों का संहार किया गया था।कालीमठ से चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित कबिल्ठा गांव महाकवि कालिदास का जन्म स्थान माना जाता है।
दूरी-
रुद्रप्रयाग से-54 किलोमीटर 
ऋषिकेश से दूरी -155 किलोमीटर



                     9)     केदारनाथ
 
                               फोटो-प्रवीन जोशी

केदारनाथ 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, उत्तराखंड के चार धाम और पंच केदार में गिना जाता है। गौरीकुंड से 18 किलोमीटर लंबे पैदल मार्ग द्वारा यहां पहुंचा जाता है।  इसके अलावा हवाई सेवाएं भी उपलब्ध है। छ: माह के लिए डोली शीतकाल में ऊखीमठ में वास करती है।केदारनाथ के रक्षक माने जाने वाले भैरवनाथ का यहां पर मंदिर है। यहां पर आदि गुरु शंकराचार्य की समाधि स्थित है। प्राचीन शिव मंदिर के दर्शन हेतु भारी संख्या में श्रद्धालु और सैलानी पहुंचते हैं।
दूरी-
रुद्रप्रयाग से 74 किलोमीटर + 14 किलोमीटर पैदल ऋषिकेश से 229 किलोमीटर।


                   10)      अगस्त्यमुनि
 

ऋषिकेश केदारनाथ मार्ग पर अगस्त्यमुनि मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित है ।पौराणिक मान्यता है कि ऋषि अगस्त्य ने कई वर्षों तक तपस्या की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम अगस्त्यमुनि पड़ा। यहां महर्षि अगस्त्य का प्राचीन मंदिर है।
दूरी -
रुद्रप्रयाग से 18 किलोमीटर 
ऋषिकेश से 158 किलोमीटर।




                  11)   पँवाली काण्ठा -
 
                                               फोटो-प्रवीन जोशी

उत्तराखंड के खूबसूरत- मनोहारी बुग्याल पँवाली काण्ठा रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल जनपद की सीमा पर स्थित है। यह त्रियुगीनारायण और गंगी के बीच कई किलोमीटर में फैला है। यह केदारनाथ और गंगोत्री के मध्य का परंपरागत पैदल मार्ग है। जखोली ब्लॉक के बधाणी ताल से 27 किलोमीटर का पैदल मार्ग तथा टिहरी गढ़वाल घुत्तू से 18 किलोमीटर का पैदल मार्ग है। यह जैवविविधता,प्राकृतिक सुन्दरता ट्रैकिंग के लिए स्थानीय और सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है।

दूरी(सड़क)-
रुद्रप्रयाग से 62 किलोमीटर
मयाली से 31 किलोमीटर





12। )कार्तिक स्वामी। 
 


शिव पुत्र कार्तिक स्वामी का यह अलौकिक मंदिर हिमालय की बर्फीली चोटियों के मध्य स्थित है। श्रद्धालुओं के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों के लिए भी सदैव आकर्षण का केंद्र रहा है। समुद्र तल से लगभग 3050 मीटर की ऊंचाई और कनक चौंरी से 3 किलोमीटर का यह पैदल मार्ग एक ऐसी चोटी पर पहुंचाता है ,जहां से लंबी हिमश्रृंखला के दर्शन किए जा सकते हैं। कनकचौरी से 3 किलोमीटर के पैदल मार्ग पर  पत्थर की ओखलियाँ हैं माना जाता है कि यह अप्सराओं की ओखलियाँ हैं।यह रुद्रप्रयाग पोखरी मोटर मार्ग के मध्य कनकचोरी से कौंच पर्वत शिखर पर है।

दूरी 
रुद्रप्रयाग से 38 किलोमीटर



                         



13)      चिरबटिया
 
                            फोटो -अमन नौटियाल 
तिलवाड़ा टिहरी मोटर मार्ग पर स्थित यह सुंदर पहाड़ी गांव है। यहां से हिमश्रृंखला के अद्भुत दर्शन होते हैं ,साथ ही अपनी जैवविविधता के लिए प्रसिद्ध है। यहां पक्षियों की लगभग 200 प्रजातियां पाई गई हैं। जो पक्षी विशेषज्ञों के लिए आकर्षण का केंद्र है ।यहां की बर्फबारी पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करती है।चिरबटिया रुद्रप्रयाग जनपद का एकमात्र स्थल है जिसको सरकार द्वारा पर्यटक ग्राम के रूप में विकसित किए जाने की योजना है।
दूरी
रुद्रप्रयाग से 40 किलोमीटर
टिहरी से 93 किलोमीटर


14)बधाणी ताल-
                                     फोटो -आलोक नौटियाल
समुद्र तल से 2100 मीटर की ऊंचाई पर यह सुंदर नैसर्गिक ताल रुद्रप्रयाग के जखोली ब्लॉक में बांगर पट्टी में स्थित है। अद्भुत प्राकृतिक नजारों और जैव विविधता से यह पूरा क्षेत्र परिपूर्ण है। बर्फबारी ,रंग-बिरंगी चिड़िया और विभिन्न प्रकार की जड़ी- बूटियों के बीच यह ताल आकर्षण का केंद्र है। इस ताल में रंग-बिरंगी गोल्डफिश तथा अन्य प्रजातियों की कई मछलियां हैं। 
दूरी
रुद्रप्रयाग से दूरी 62 किलोमीटर 
मयाली से 30 किलोमीटर


      15)     मठियाणा देवी का मन्दिर
                          फोटो साभार -सुनील सेमवाल
 मठियाणा देवी यह सिद्ध पीठ मां दुर्गा का मंदिर तिलवाड़ा -सौंराखाल मोटर मार्ग के मध्य स्थित है ।सिलगांव से लगभग  2 किलोमीटर  की पैदल चढ़ाई के बाद इस दिव्य मनोहारी स्थल पर पहुंचते हैं। बुराँश के घने जंगलों के बीच इस चोटी से दूर-दूर हिमदर्शन और विभिन्न पहाड़ी चोटियाँ दिखाई पड़ती है। यहां काफी संख्या में श्रद्धालु और सैलानी आते हैं।यहाँ से 1 किलोमीटर की चढ़ाई पर घंंटा कर्ण का मन्दिर स्थित है।
 तिलवाड़ा से दूरी 20 किलोमीटर।



                  16)     इंद्रासनी देवी का मंदिर
 
                                             फोटो-प्रवीन जोशी

इंद्रासनी देवी का मंदिर तिलवाड़ा कण्डाली मार्ग पर कण्डाली में स्थित है।मान्यता है कि इस पवित्र पीठ में देवराज इंद्र द्वारा माता इंद्रासनी की पूजा की गयी थी, स्वयं इंद्र भगवती के आसन के रूप में बने थे, इस कारण इसका नाम इंद्रासना पड़ा, बाद में वह इंद्रासणी बोलचाल में हो गया।

दूरी-
तिलवाड़ा से 4.5 
रुद्रप्रयाग से14 किलोमीटर 






                  17)  मद्महेश्वर मंदिर
                                फोटो-प्रवीन जोशी     
पंच केदारों में से एक तृतीय केदार मदमहेश्वर में भगवान शिव की नाभि की पूजा की जाती है। यहां पहुंचने के लिए उखीमठ से राँसी फ़िर राँसी गांव से 2o किलोमीटर लम्बा किन्तु पैदल मार्ग है। छः माह के लिए डोली यहां से शीतकाल में ऊखीमठ जाती है। समुद्र तल से लगभग 3290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य लिए हुए हैं। यहाँ से थोड़ी सी चढ़ाई के बाद बूढ़ा मद्महेश्वर बुग्याल से चौखंबा पर्वत के भव्य दर्शन होते हैं।मुख्य मन्दिर और बूड़ा मद्मशेश्वर के बीच में एक  मनुष्य की आकृति का पत्थर है,इसे *धवाड़ी देवता* के नाम से जाना जाता है जो श्रधालुओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है।इस मार्ग पर दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ हैं।
दूरी
रुद्रप्रयाग से
ऊखीमठ से



                 18)    त्रियुगी नारयण मन्दिर
 
                                               फोटो-प्रवीन जोशी
यह पौराणिक विष्णु भगवान का मंदिर शिव पार्वती का विवाह स्थल कहा जाता है। माना जाता है कि यहां पर हवन - कुंड में जल रही अग्नि युगों से जलती आ रही है। यह हिंदुओं का लोकप्रिय तीर्थस्थल है। मंदिर के सामने ब्रह्म- शिला को दिव्य विवाह- स्थल माना जाता है। यहां पर अनेक विवाह संपन्न होते हैं मंदिर के बाहर ही सरस्वती गंगा नामक एक पवित्र धारा निकलती है।
दूरी
रुद्रप्रयाग से
सोनप्रयाग से






                    19)      सूर्य प्रयाग
 
                                         फोटो-अरुण चमोली
यह लस्तर और मंदाकिनी नदी का संगम स्थल है ।जो कि ऐतिहासिक है क्योंकि यहां जलधाराएं संगम पर सूर्य को अर्घ देते भी पूर्व दिशा की ओर प्रवाहमान है। यहां *बैशाखी* का मेला लगता है जो 3 दिन तक चलता है। जिसमें सभी स्थानीय देवी-देवताओं की डोलियां स्नान के लिए लाई 
जाती हैं। अब यह मेला स्थानीय विकास मेले के रूप में भूमिका अदा कर रहा है। 
दूरी -
रुद्रप्रयाग से 
दूरी ऋषिकेश से।


                             


20)     गुप्तकाशी
 
                                  फोटो-दिनेश चंद्र थपलियाल
धार्मिक ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ गुप्तकाशी प्राकृतिक सौंदर्य को अपने आप में समेटे हुए हैं। यहां पर भगवान विश्वनाथ का एक भव्य मंदिर है। मान्यता है कि यहां पांडवों को दर्शन देने के पश्चात भगवान शिव गुप्त वास पर चले गए थे। मंदिर - परिसर में मणिकर्णिका कुंड है ।जिसमें गंगा और यमुना की जलधाराएं गिरती हैं। इसके अतिरिक्त यहां अर्धनारीश्वर चंद्रशेखर महादेव मंदिर तथा पांडवों की मूर्तियां पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।






                        21)   जाख देवता
 

अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के बीच यह यह मन्दिर केदारनाथ मार्ग में गुप्तकाशी से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां वर्ष में बैसाखी दो गते मेला लगता है। पूरे क्षेत्र से श्रद्धालु भगवान जाख देवता के दर्शन के लिए आते हैं। इस मेले की तैयारियां स्थानीय लोगों द्वारा चार-पांच दिन पहले से की जाती है। बांज की लकड़ियों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है, जिस पर जाख देवता किसी मनुष्य पर अवतरित होकर नाचते हैं जबकि मनुष्य को कोई क्षति नहीं पहुंचती। जो कि श्रद्धालुओं को श्रद्धा से अभिभूत करते हैं।




22))ऊखीमठ
 

सुंदर प्राकृतिक स्थान भक्ति और श्रद्धा का केंद्र ऊखीमठ रुद्रप्रयाग चोपता मुख्य मोटर मार्ग पर स्थित है। समुद्र तल से 1311 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर यह स्थान मद्महेश्वर और केदारनाथ की डोली का छह माह वास स्थान है। बाणासुर की बेटी उषा तथा श्रीकृष्ण के पुत्र अनिरुद्ध का विवाह स्थल होने के कारण इस स्थान का  नाम उषामठ था, कालांतर में जो ऊखीमठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।



            23)      नारायण कोटी मंदिर समूह
 

                  फोटो साभार-जसपाल सिंह पुजारी
गुप्तकाशी से लगभग 3 किलोमीटर गौरीकुंड राजमार्ग पर नारायणकोटी गांव स्थित है। नारायण का अर्थ है भगवान विष्णु और कोटि का अर्थ है करोड़ों अर्थात करोड़ों मंदिरों का समूह। पौराणिक कथा के अनुसार नारायण कोटी स्थान पर 360 मन्दिर निर्मित किए गए थे। जो सभी हिंदू देवी-देवताओं के थे । राज्य का यह पहला स्थान है जहां पर नवग्रह देवताओं के मंदिर स्थित है। वर्तमान समय में अधिकांश मूर्तियां खंडित अवस्था में है। यहां पर मंदिर समूह में ही मणिकर्णिका कुंड और द्रोपदी तरणताल स्थित है।

                             



24) वासुकी ताल
 
वासुकी ताल समुद्र तल से 14200 फीट,केदारनाथ धाम से 7 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह चारों और ब्रह्मकमलों एवं भव्य पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ है। इसके ठीक सामने त्रियुगी नारायण मंदिर है और यहां से खतलिंग ग्लेशियर के लिए रास्ता निकलता है। इस ताल का जल गहरे नीले रंग का है।पथारोहियों  और अध्यात्म खोजी मनुष्यों  के लिए सदैव से आकर्षण का केंद्र रहा है।  
केदारनाथ से दूरी-7 किलोमीटर





                    25)         पांडव सेरा
 
                                                          
 नंदी कुंड के रास्ते में पड़ने वाला 3 से 4 किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत लंबा-चौड़ा विशाल मैदान है ।यह उखीमठ से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।इस मैदान से 3 किलोमीटर की दूरी पर ही नंदी कुंड है। मान्यता है कि कुछ समय के लिए पांडवों का यहां निवास रहा , जिस दौरान उन्होंने यहां पर धान उगायी थी।यहीं पास में ही एक नहर के भग्नावशेष भी हैं, जिन्हें पाण्डवकालीन बताया जाता है |अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर रास्ता ट्रैकर्स के लिए  आकर्षण का केंद्र है।




                           26)      गौरीकुंड
 

 इस ऐतिहासिक स्थान से केदारनाथ की पैदल दूरी लगभग 14 किलोमीटर है यहां पर गर्म पानी के सोते हैं। यह समुद्र तल से 6502 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर मां पार्वती का दिव्य मंदिर  तथा गौरी झील है ।जो 2013 की आपदा के बाद से स्थिति जलधारा के रूप में रह गयी है।  अपने ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के साथ-साथ यह केदारनाथ का बेस कैंप होने से पर्यटकों तथा श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान के रूप में है।
दूरी
रुद्रप्रयाग से दूरी
ऋषिकेश से दूरी-



              27)  पटांगणिया सैंण 
यह मयाली टिहरी मोटर मार्ग पर पालाकुराली से करीब 2 किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित है।  विकास खंड जखोली में समुद्र तल से लगभग 2000 मीटर की ऊंचाई पर  हिलाऊँ गाड  इसी स्थान से उद्गमित  होती है। यहां पर मुख्य रूप से बाँज, बुराँश,देवदार,खर्सू, मोरू आदि के सघन वन तथा घास के मनभावन मैदान हैं।
दूरी
रुद्रप्रयाग से पालकुराली-
मयाली से पालकुराली-








                  28)     मनणी बुग्याल
                        फोटो साभार-हेमंत चौकियाल

 ऊखीमठ ब्लॉक में रांसी से लगभग 30 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद मनणी  बुग्याल पहुंचा जाता है। इसके मुख्य पड़ाव सनेरा,पटुड़ी,विनायकधार, सीला समुद्र हैं ।यह फूलों की घाटी की तरह अद्भुत फूलों से भरा हुआ बुग्याल है यहां पर इतने प्रकार के पुष्प प्रजातियाँ  हैं कि जिनको गिनना मुश्किल है। केदारखंड के अनुसार भगवती के क्रुद्ध  होने पर यहां पर उन्हें मनाया गया था इसलिए इस स्थान का नाम मनणी कहा जाता है । इसके अलावा मान्यता है कि यहां पर पांडवों के अस्त्र-शस्त भी  रखे हैं। जिनकी अभी तक भी राँसी गांव  के भंडारी लोगों द्वारा सुरक्षा की जाती है। । मंदिर  बहुत छोटा परन्तु कत्यूरी शैली का जान पड़ता है,जहां पर मंडणा माई की मूर्ति(जिसमें उनका एक पांव जमीन में लेटे शिव के बदन पर है)
दूरी
रुद्रप्रयाग से रांसी-







              29)      रुच्छ महादेव
                फोटो आभार -आलोक नौटियाल
 रुच्छ महादेव कालीमठ से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर गुप्तकाशी- चौमासी मोटर मार्ग पर  खोनू गांव से 1 कि0मी0की पैदल दूरी पर है | सड़क से करीब 1 किलोमीटर नीचे उतरने पर खाम तथा मनणा नामक  नदी के संगम पर बीच में एक बड़ी सी प्रस्तर शिला को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। यहां पर फण मण्डना माई का मंदिर है।इस स्थान का वर्णन  केदार खंड में गया।   यह तीर्थ  *अर्धगया *तीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है | 
दूरी
रुद्रप्रयाग से। 





 
            30)       जड़ी पाणी
                             फोटो साभार-अनिल सेमवाल

यह स्थान जखोली ब्लॉक की बांगर पट्टी में बधाणी ताल से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां शिव का एक मंदिर है। यह बधानी ताल से पँवाली कांठा का ट्रैकिंग मार्ग भी है। इस स्थान पर बांगर पट्टी के पशुपालक छ: माह निवास करते हैं यह अद्भुत सुंदर बुग्याल क्षेत्र है। यह लस्तर का उद्गम स्थल भी है। यहां पर आप रूपी शिवलिंग है, इसके नीचे से तीन प्रकार का पानी निकलता है। उन्हीं में से एक में पानी तांबे का पानी कहा माना जाता है,जिससे यहां पर तिलक किया जाता है।
दूरी
रुद्रप्रयाग से 62  किलोमीटर
मयाली से 31 किलोमीटर



31) कुण्ड सौड़ 


यह रमणीक बुग्याल विकासखण्ड जखोली के उरोली,इजरा के अन्तर्गत आता है।यह मोटर मार्ग से लगभग आधा किलोमीटर पैदल दूरी पर है।यहाँ देवदार का जंगल,नागेन्द्र देवता की पवित्र कुण्डी,आराध्य देव नर्सिंग भगवान का भव्य मन्दिर जहाँ त्रिशूल और घंटियाँ हैं।यहाँ से दिखने वाले हिमालय का अर्ध चंद्राकार दृश्य मन मोह लेता है।यहाँ प्रत्येक वर्ष अप्रैल,मई माह में नागेन्द्र देवता धार्मिक ऐवम पर्यटन विकास मेले का आयोजन स्थानीय लोगो की जन सहभागिता से किया जाता है।यहीं पर स्थित धारकूड़ा सौड़ भारत के मानचित्र की तरह दिखने वाला घास का मैदान आकर्षण का केंद्र है।

Thursday, April 27, 2023

आनंदम् पाठ्यचर्या की ज़रूरत क्या है...?

       एक IAS अधिकारी दहेज उत्पीड़न के मामले में गिफ़्तार, अस्पताल में किडनी चोर गिरफ़्तार, रिश्वत लेते इंजिनियर गिरफ़्त में, कोटा में तैयारी कर रही छात्रा ने की खुदखुशी, इस तरह की सुर्खियां हम सभी ने अख़बारों, समाचारों में खूब देखी हैं । इन सभी मामलों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि ये सभी वो लोग हैं जिन्हें हम पढ़े- लिखे सभ्य लोग कहते हैं। इस पढ़े लिखे होने में यहाँ एक खोखलापन नज़र आता है। ऐसी भूख जिसके ख़त्म होने के कोई आसार नज़र नहीं आते। आप क्या सोचते हैं इस पढ़े लिखे होने में जो बनना था क्या वह बन पाए? 
शिक्षा एक पूर्ण मानवता की ओर इशारा करती है क्या इसमें कहीं मानवता दिखती है? 
लालच, निराशा, ईर्ष्या , द्वेष, भूख ऐसी भावनाएं जो हमारी खुशियाँ छीन लेती हैं। हमें मिलता है एक ऐसा समाज जहाँ हर इंसान परेशान है और दूसरे का शोषण कर आगे बढ़ना चाहता है। 

वैश्विक खुशहाली रिपोर्ट 2023 की बात करें तो 136 देशों में भारत 125 वें स्थान पर है, जो हमारी स्थिति को बयाँ करने के लिए काफ़ी है। शायद खुशहाली भी खरीदी जाती तो रिश्वत से खरीद ली जाती लेकिन कुदरत ने यह तोहफ़ा हमारे साथ उपहार में भेजा है। ज़रूरत है तो बस इसको महसूस करने की। 
हमारा व्यवहार हमारे विचारों का परिणाम है विचार अपने आस पास से ही हम ग्रहण कर लेते हैं। रिश्वत/ जुए के पैसे से अमीर हुए व्यक्ति को समाज में इज़्ज़त मिलती देख एक बच्चा सीखता है कि पैसा महत्वपूर्ण है। यह मायने नहीं रखता कि पैसे का ज़रिया क्या है? इस प्रकार के उदाहरण ऐसे विचारों को जन्म देते हैं जो न व्यक्ति को खुश रख सकते हैं और न ही इनसे एक समृद्ध खुशहाल समाज हमें मिल सकता है। 
विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ बच्चे को अपने हुनर निखारने के सभी अवसर उपलब्ध होते हैं। सम्मान, करुणा, सामनुभूति, क्षमा और साहस आदि सभी भाव प्रदर्शित करता है। विद्यालय में आनंदम् पाठ्यचर्या हमें यह अवसर देती है कि हम इन गुणों को निखार पाएं, इन गुणों को महत्व दे पाएं। इन सभी गुणों का जीवन में होना और इनका प्रयोग जीवन को आनंद से भर देता है, यह अहसास कराती है आनंदम् पाठ्यचर्या। 
हम आज से 10-15 वर्षों में आगे झाँकें तो आज के विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्र का नेतृत्व कर रहे होंगे। जो सिर्फ़ काम पैसे के लिए नहीं कर रहे होंगे बल्कि ख़ुशी से भरपूर जीवन ज़िंददिली से जीना जानते होंगे। दूसरों की मुस्कान में अपनी ख़ुशी देखते होंगे और उनकी जीत में अपनी जीत। आनंदम् की कक्षा में बच्चों के रिफ्लेक्शन से मैं अक्सर ऐसे कल की कल्पना से मुस्कुरा उठती हूँ। 
आनंदम् पाठ्यचर्या की ज़रूरत क्या है? यह सवाल बिल्कुल ऐसा ही है जैसे
फूलों में खुश्बू की ज़रूरत क्या है? 
बादल में पानी की ज़रूरत क्या है? 
पेड़ों में हरियाली की ज़रूरत क्या है? 
सूरज को तपने की ज़रूरत क्या है? 

Monday, July 26, 2021

निष्ठा ऑनलाइन प्रशिक्षण के लिए दीक्षा पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन


वर्ष 2021 - 22 में समग्र शिक्षा के अंतर्गत माध्यमिक स्तर (कक्षा 9-12) तक के सभी राजकीय एवम अशासकीय विद्यालयों के सहायक अध्यापकों, प्रवक्ताओं, प्रधानाध्यापको और प्रधानाचार्यों का सेवारत प्रशिक्षण NISTHA कार्यक्रम के अंतर्गत ऑनलाइन मोड से 1 अगस्त 2021 से फरवरी 2022 तक चरणबद्घ तरीके से सम्पन्न किया जाना है।

nishtha online training



 

यह प्रशिक्षण भारत सरकार के दीक्षा प्लेटफॉर्म पर होना है जिसको आप नीचे दिए गए लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं।

 diksha.app

दीक्षा app डाउनलोड करने के बाद आपको अपना रजिस्ट्रेशन करना होगा जिसमें आपको निम्न जानकारी भरनी होंगी-
mobile number
gmail id
ट्रेजरी कोड
पासवर्ड जो आपको बनाना है और सेव रखना है।

आप रजिस्ट्रेशन की जानकारी के लिए नीचे दिए हुए लिंक पर क्लिक करके वीडियो देख सकते हैं जिसमें रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया दी गयी है- 

diksha portal registration


nishtha online training


रजिस्ट्रेशन के लिए चरण इस प्रकार से होंगे-

  सबसे पहले दीक्षा app डाउनलोड करना है।

आगे इस प्रकार से रजिस्टर कर सकते हैं- 

  1. अपने मोबाइल में Diksha App open करे। 
  2. अपने मनपसंद भाषा का चयन करे - Hindi या English या अन्य और जारी रखें बटन दबाये। 
  3. अब Teacher/शिक्षक सेलेक्ट करें। 
  4. अपने बोर्ड का चुनाव करे - उदहारण के लिए - State उत्तराखण्ड एवं दाखिल करे बटन दबाये। 
  5. अब माध्यम चुने - Hindi / English / Other जो आप चुनना चाहे और दाखिल करे बटन दबाये।
  6. अब कक्षा का चुनाव करे - आप जिस भी कक्षा से संबंधित हैं। और दाखिल करे बटन दबाये। 
  7. अब तक आपका Self - Enrolment का कार्य पूर्ण हो गया है। अब आप स्क्रीन पर X (Close) चयन करे या सबसे नीचे "पाठ्यपुस्तक चुनकर शुरुआत कीजिए" ऑप्शन पर क्लिक कर Dashboard पर जाएँ। 
  8. Dashboard में नीचे दाएँ कोने में Profile (प्रोफाइल) पर क्लिक करें।  
  9. अब प्रोफाइल विवरण पेज खुलेगा जिसमें नीचे जाने पर "लॉग इन करे" बटन पर क्लिक करें। 
  10. अब Log In पेज खुलेगा। यहाँ पर "Register Here" लिंक पर क्लिक करें। 
  11. अब Registration पेज खुलेगा। 
  12. रजिस्ट्रेशन पेज पर अपना जन्म तिथि के वर्ष का चयन करें। 
  13. फिर अपना सही-सही पूरा नाम दर्ज करें। फिर Mobile Number या Email Address का ऑप्शन चुनें। OTP इसी मोबाइल या ईमेल पर प्राप्त होगा। 
  14. अगले कॉलम में Password बनाये। Password कम-से-कम 8 अंक का होना चाहिए जिसमें कैपिटल लेटर, स्मॉल लेटर, कोई सिंबल, और अंक होने चाहिए। उदहारण - Riji@12345 इस प्रकार का पासवर्ड नहीं बनाने पर रजिस्ट्रेशन नहीं हो पायेगा। 
  15. पुनः अगले कॉलम में वही पासवर्ड डालकर कन्फर्म करें। 
  16. अब "I understand and accept DIKSHA Terms of use" को टिक करें।
  17.  अब Register बटन हाईलाइट हो जायेगा , इसपर क्लिक करे। (कभी-कभी Captcha Verification भी हो सकता है)
  18. Register बटन पर क्लिक करते ही OTP मांगेगा। आपके मोबाइल नंबर या ईमेल पर OTP प्राप्त हुआ होगा। दिए गए बॉक्स में OTP दर्ज करे और Submit कर दें। 
  19. अब आपका रजिस्ट्रेशन प्रॉसेस पूर्ण हो गया है। आप स्वतः ही Log In पेज पर आ जायेंगे। 
  20. लॉगइन पेज पर दिए गए बॉक्स में मोबाइल नंबर या ईमेल ID डालें एवं Password डालें (जो पासवर्ड आपने रजिस्ट्रेशन के वक्त बनाया था) और "LOGIN" बटन पर क्लिक करें। 
  21. लॉगिन होने के बाद Dashboard खुलेगा। 
  22. पुनः Dashboard के नीचे दाहिने कोने में प्रोफाइल (Profile) पर क्लिक करें। 
  23. आपकी DIKSHA ID दिखेगी। इस पेज पर "विवरण दाखिल करें" ऑप्शन का चयन करें। 
  24. Teacher का चयन करें 
  25. अपना State चयन करें। 
  26. आपका विवरण खुलेगा जहाँ Mobile / Email जो आपने रजिस्ट्रेशन के वक्त दिया होगा स्वतः भरा हुआ दिखाई देगा। अगर दोनों में कोई खली रहे तो सही जानकारी डालकर OTP वेरीफाई कर लें। यहाँ मोबाइल नंबर वेरीफाई होना अत्यावश्यक है।
  27. अगला कॉलम "राज्य/बोर्ड/संस्था द्वारा अनुरोध किया गया ID" में ID ज्ञात हो तो डालें 
  28. आगे "मैं DIKSHA के एडमिन के साथ इन विवरणों को साझा करने के लिए सहमत हूँ" वाले चेक बॉक्स में टिक कर "दाखिल करें" बटन को दबायें। 
  29. आपका Diksha App Par Registration पूर्ण हो चुका है। अब आप Schedule के अनुसार Course करने के लिए तैयार हैं।


1 अगस्त से आपकी ट्रेनिंग इस app के माध्यम से शुरू हो जाएगी। आपको एक लिंक भेजा जाएगा जिस पर क्लिक करते ही आपका कोर्स खुल जायेगा।

आपको जिसमें 13 मॉड्यूल पूरे करने होंगे और उसके बाद क्विज पास करने के लिए 70% मार्क्स लाना अनिवार्य होगा।



अन्य किसी भी तकनीकी समस्या के लिए आप निम्न मोबाइल no पर सम्पर्क कर सकते हैं।

ऊखीमठ ब्लॉक-
१.पंकज भट्ट -74093 15392
२.मनीष जी-9639201999

जखोली-
१.पीयूष शर्मा-97563 86309
२.अमृता नौटियाल-7251964461

अगस्त्यमुनि-
1.रविन्द्र पंवार -9412364431
2.राजीव लोचन- 97565 33547
3.आनन्द सिंह नेगी-9760859660

रुद्रप्रयाग डाइट-
डॉ0 विनोद कुमार यादव-94115 81166
डॉ0 डी0 पी0 सती-9639165154
श्री अनिल चौकियाल-96905 77630







Tuesday, January 12, 2021

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद(NCTE)


भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा मई 1973 में शिक्षा आयोग की अनुशंसा पर  गैर संवैधानिक संस्था के रूप में  राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की स्थापना की गई।

शुरुआती चरण में इसका कार्य केंद्र व राज्य सरकारों को शिक्षक शिक्षा से जुड़े मामलों में सलाह देना था।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 और कार्य योजना 1996 की अनुशंसा के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा अधिनियम परिषद 1993 के अधीन राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद एक संवैधानिक निकाय के रूप में 17 अगस्त 1995 से अस्तित्व में आया।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की  चार क्षेत्रीय समितियां हैं -
पूर्वी क्षेत्रीय समिति भुवनेश्वर उड़ीसा
 पश्चिमी क्षेत्रीय समिति भोपाल 
उत्तर क्षेत्रीय समिति जयपुर 
दक्षिण क्षेत्रीय समिति बेंगलुरु कर्नाटक में

 इस परिषद के प्रमुख कार्य अध्यापक शिक्षा के स्तर को विकसित करने हेतु अनुदान की व्यवस्था करना इसके लिए एक टीम नियुक्त की जाती है ।

 शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों के बारे में उपयुक्त योजनाएं और कार्यक्रमों को तैयार करता है।

राष्ट्रीय स्तर राज्य स्तर पर शिक्षण संस्थाओं तथा शिक्षा विभाग के स्तर के शैक्षिक शोध कार्यों में समन्वय स्थापित करना।

 सभी स्तरों के केंद्रीय तथा राज्य प्राथमिक स्तर तथा महाविद्यालय स्तर के अध्यापक शिक्षा की व्यवस्था का निरीक्षण करना तथा उनके विकास एवं सुधार हेतु साधनों का सुझाव देना।

 पाठ्यक्रम स्टाफ साधनों सुविधाओं के संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर का निर्धारण करना।

अंतर्राज्यीय स्तरों  के लिए निरीक्षण करना मूल्यांकन करना विकास एवं प्रसार का अवलोकन करना।


 अध्यापक शिक्षा के पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार करना अध्यापकों की सामाजिक व्यवस्था को सुनिश्चित करना तथा अध्यापक शिक्षा के भावी कार्यक्रम तैयार करना है।

मान्यता प्राप्त संस्थानों की पहचान करता है और शिक्षक शिक्षा प्रणाली के विकास कार्यक्रमों के लिए नए संस्थानों की स्थापना करता है।

अध्यापक शिक्षा से संबंधित निम्न शोध पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है
 इंडियन जर्नल आफ टीचर एजुकेशन 
अन्वेषिका 
अध्यापक साथी 



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Monday, January 11, 2021

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद NCERT


NCERT का पूरा नाम NATIONAL COUNCIL OF EDUCATIONAL RESEARCH AND TRAINING है।


इस परिषद की स्थापना  1 सितम्बर 1961 में की गई।


विद्यालयी शिक्षा में आवश्यक सुधार के लिए एनसीईआरटी की स्थापना की गई।


NCERT विद्यालयी शिक्षा से जुड़े मामलों पर केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों को सलाह देने का कार्य करती है।



एनसीईआरटी के संगठन में केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत 12 सदस्य होते हैं, दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति,अध्यक्ष केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री, प्रत्येक राज्य का एक-एक प्रतिनिधि और भारत सरकार का शैक्षिक सलाहकार होते हैं।


 इसके चार क्षेत्रीय महाविद्यालय अजमेर मैसूर भुवनेश्वर और भोपाल में है।
 इसका मुख्यालय दिल्ली में है जिसके कई विभाग हैं इसमें केंद्र भी स्थापित किए गए हैं ।




इस परिषद के मुख्य कार्य -

 प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा के सुधार हेतु शोध कार्य और शोध कार्यों को अनुदान देना।
शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता लाना।
 सेवारत अध्यापक और पूर्व सेवा अध्यापकों को नेतृत्व प्रदान करना।
 नवीन परिवर्तनों और आयामों से अवगत कराना और प्रशिक्षण देना।
शिक्षण की उच्च तकनीकी को प्रोत्साहित करना।
 प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा संबंधित कार्यों के लिए आर्थिक सहायता भी दी जाती हैं।
1 से 12 तक की पुस्तकें तैयार करने का कार्य NCERT द्वारा किया जाता है।

विद्यालयों में विज्ञान किट NCERT द्वारा तैयार की जाती है।


 एनसीईआरटी के क्षेत्र-
 एनसीईआरटी के अध्यापक शिक्षा विभाग के मुख्य क्षेत्र इस प्रकार से है 
प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर के लिए विद्यालय अनुभव हैंडबुक विभाग।

 प्राथमिक स्तर के अध्यापक शिक्षा के कौशल पर आधारित पाठ्यक्रम विभाग।

 अध्यापक शिक्षा की प्रवेश प्रक्रिया हेतु  विभाग।

 अध्ययन सामग्री विभाग अध्यापक शिक्षा विभाग द्वारा सेवारत अध्यापकों को प्रशिक्षण एवं प्रसार की भी व्यवस्था की जाती है ।

 प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की कार्यशाला सेमिनार वार्षिक सम्मेलन इत्यादि की व्यवस्था करना है।


Sunday, January 10, 2021

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UNIVERSITY GRANTS COMMISSION

 


विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन 28 दिसंबर 1953 को भारत सरकार द्वारा किया गया।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग केंद्रीय सरकार का आयोग है जो विभिन्न विश्वविद्यालयों को मान्यता देता है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग 1948-49 की सिफारिश पर किया गया तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद थे।

यूजीसी का बोध वाक्य है ज्ञान विज्ञान विमुक्तये।

 भारत सरकार ने इसे 1956 में स्वायत्त संस्था का दर्जा दिया।


विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का मुख्य कार्यालय दिल्ली में है तथा 6 क्षेत्रीय कार्यालय पुणे ,भोपाल, कोलकत्ता,  हैदराबाद ,गुवाहाटी और बेंगलुरु में स्थित हैं।

आयोग में अध्यक्ष उपाध्यक्ष तथा भारत सरकार द्वारा नियुक्त 10 अन्य सदस्य होते हैं।


यूजीसी के अध्यक्ष का कार्यकाल 5 वर्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल 3 वर्ष होता है।

 डॉ 0 शांति स्वरूप भटनागर यूजीसी के पहले अध्यक्ष थे।


विभिन्न प्रकार के विश्वविद्यालय जो यूजीसी द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं केंद्रीय विश्वविद्यालय 54, राज्य विश्वविद्यालय 416, डीम्ड 124,प्राइवेट विश्वविद्यालय 364।
कुल विवि 958।

उत्तराखण्ड में 7 October 2020 को UGC ने 24  विश्वविद्यालय को अवैध( fake )विश्वविद्यालय बताया था।


उत्तराखंड में यूजीसी से मान्यता प्राप्त केंद्रीय विश्वविद्यालय 1,राज्य विश्वविद्यालय 11,प्राइवेट 18 
कुल विश्वविद्यालय- 33



विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अनुदान आयोग के प्रमुख कार्य-
 विश्वविद्यालय के विकास तथा संचालन हेतु आर्थिक सहायता प्रदान करना।


नए विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए राज्य को परामर्श देना और 5 वर्ष के संचालन का संपूर्ण व्यय वहन करना।

 
केंद्रीय विश्वविद्यालय को विकास और संचालन हेतु सम्पूर्ण व्यय के लिए अनुदान देना तथा राज्य के विश्वविद्यालयों के विकास हेतु अनुदान देना।

विश्वविद्यालय स्तरीय शिक्षा उच्च शिक्षा में छात्रों हेतु कार्य योजना तैयार करना और क्रियान्वयन हेतु संबंधित संस्थानों को परामर्श प्रदान करना।


 अध्यापकों के आवास हेतु विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालयों को अनुदान दिया जाता है।


 विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में समानता बनाए रखना तथा उनके बीच समन्वय स्थापित करना।


यूजीसी द्वारा शिक्षा में सुधार के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं बनती हैं।




UGC के वर्तमान अध्यक्ष-   प्रोफेसर धीरेंद्र पाल सिंह।

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Friday, January 8, 2021

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 NATIONAL EDUCATION POLICY


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 से पूर्व कांग्रेस सरकार ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1968  राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की थी।

 इसके पश्चात राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनने पर सरकार ने शिक्षा का सर्वेक्षण करवाया और उसे शिक्षा की चुनौती नीति संबंधी परिपेक्ष  नाम से अगस्त 1983 में प्रकाशित किया।


राष्ट्रीय शिक्षा नीति दस्तावेज मई 1986 में प्रकाशित किया गया और इस शिक्षा नीति की घोषणा के बाद नवंबर 1986 में इसकी कार्ययोजना दस्तावेज़ प्रकाशित किया गया।

शिक्षा नीति 1986 का प्रमुख उद्देश्य था सभी को समान शिक्षा।


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का दस्तावेज 12 भागों में विभाजित है-
  1. भूमिका
  2. शिक्षा का सार तथा भूमिका
  3. राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली
  4. समानता के लिए शिक्षा
  5. विभिन्न स्तरों पर शिक्षा का पुनर्गठन
  6. तकनीकी एवं प्रबंधकीय शिक्षा
  7. प्रणाली को कार्यशील बनाना
  8. विषय सामग्री तथा प्रक्रिया का नवीनीकरण
  9. शिक्षक 
  10. शिक्षा का प्रबंधन
  11. साधन एवं  पुर्ननिरीक्षण
  12. भविष्य


शिक्षा के आधुनिकीकरण और आईटी की भूमिका की मुख्य बात इसमें कही गई।


 शिक्षा का पुनर्गठन बचपन की देखभाल महिला सशक्तिकरण और वयस्क साक्षरता पर अधिक ध्यान दिया गया ।


राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली पूरे देश में लागू करने की बात कही गई 10 + 2+ 3 शिक्षा संरचना लागू की जाए।


 शिक्षा का विकेंद्रीकरण किया जाए केंद्र में भारतीय शिक्षा  सेवा, प्रांत में प्रांतीय शिक्षा सेवा और जिले में जिला शिक्षा परिषद की स्थापना की जाए।

 कुल बजट का 6% शिक्षा के लिए तय करने का प्रावधान रखा जाए।


 सभी स्तरों का पुनर्गठन किया जाए प्रारंभिक शिक्षा, निरौपचारिक शिक्षा, ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड लागू करने की बात कही गई ।


Operation black board के अंतर्गत प्राथमिक विद्यालयों की न्यूनतम आवश्यकताओं दो कमरों का भवन ,फर्नीचर,शिक्षण सामग्री,पुस्तकालय सामग्री ,खेल सामग्री कम से कम 2 शिक्षक प्रत्येक विद्यालय में नियुक्त होने चाहिए।


 माध्यमिक शिक्षा बोर्ड माध्यमिक शिक्षा में सुधार तथा नवोदय विद्यालय की स्थापना की पूरी रूपरेखा प्रस्तुत की गई ।


नए  मुक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना का सुझाव रखा गया और इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय की कार्यक्रमों की विस्तार की बात कही गई।


(इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना 1985 में हुई थी )।

देश में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद तथा राज्य में तकनीकी शिक्षा परिषद बोर्ड को सुदृढ़ करने की बात कही गई ।

1990 तक प्राथमिक शिक्षा को सर्व सुलभ बनाए जाने की बात कही गई जिसमें 1 किलोमीटर के अंतर्गत 1 प्राथमिक स्कूल खोले जाने की बात कही गई।

 1995 तक 11 से 14 आयु वर्ग के बच्चों के लिए शत प्रतिशत सुलभ शिक्षा की बात कही गई।


 1995 तक व्यवसायिक वर्ग में 25% छात्र छात्राओं छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर पाएंगे ऐसी बात कही गई।


  प्रत्येक जिले में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान डाइट की स्थापना की गई जाएगी।


इसके पश्चात नई सरकार के आते ही प्रधानमंत्री श्री विष्णु प्रताप सिंह ने 1990 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की जिसके अध्यक्ष आचार्य राममूर्ति थे। आचार्य राममूर्ती  समिति 1990।



जिसका प्रमुख कार्य था 1986 की नीति की समीक्षा करना संशोधन हेतु सुझाव देना संशोधित नीति का क्रियान्वयन हेतु सुझाव देना।

 इसके पश्चात पुनः कांग्रेस सत्ता में आई तो 1986 में जनार्दन रेड्डी समिति 1992 में  गठित की गई।


 राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में संशोधित शिक्षा नीति 1992 में लाई गई।

operation blackboard योजना  प्राथमिक  स्तर पर 1987 में लागू की गई।

 operation blackboard योजना उच्च प्राथमिक स्तर पर 1992 में लागू की गई।



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Thursday, January 7, 2021

राष्ट्रीय शिक्षा आयोग(कोठारी कमीशन) 1964-66 NATIONAL EDUCATION COMMISSION

 


देशभर में एक समान शिक्षा नीति का निर्माण करने के उद्देश्य से 14 जुलाई 1964 को राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया गया।

आयोग के अध्यक्ष डॉ0 दौलत सिंह कोठारी (तत्कालीन अध्यक्ष विश्वविद्यालय अनुदान आयोग)।

कुल सदस्य संख्या 17 

12 भारतीय तथा 5 विदेशी शिक्षा विशेषज्ञ थे जो इंग्लैंड,अमेरिका,फ्रांस,जापान और रूस से थे।

आयोग का कार्यक्षेत्र पूरे देश की तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कर उसमें सुधार के लिए सुझाव देना।

आयोग ने अपना प्रतिवेदन शिक्षा एवं राष्ट्रीय प्रगति 29 जून 1966 को भारत सरकार को प्रेषित किया।

इसी आयोग की सिफारिशों के फलस्वरूप 1968 की शिक्षा नीति अस्तित्व में आई।

केन्द्र सरकार शिक्षा पर बजट 6% खर्च करे।


6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य पर निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

1से 3 वर्ष की पूर्व प्राथमिक शिक्षा की बात कही।


 सामान्य शिक्षा की अवधि प्राथमिक एवं माध्यमिक कुल 10 वर्ष होनी चाहिए।

विषयों का विशिष्टिकरण 10 वीं के बाद होना चाहिए।

10+2+3 शिक्षा संरचना का सुझाव दिया।


 विद्यालय संकुल ओं का निर्माण किया जाए एक संकुल में एक माध्यम के स्कूल और उसके निकटवर्ती सभी प्राथमिक स्कूल हों।


 प्रथम सार्वजनिक परीक्षा 10 वर्ष की सामान्य शिक्षा प्राप्त करने पर होनी चाहिए

 शिक्षा के पांच उद्देश्य लक्ष्य निर्धारित किए गए जिन्हें पंचमुखी कार्यक्रम कहा गया ।
 1 ) शिक्षा द्वारा उत्पादन में वृद्धि
 2 )शिक्षा द्वारा सामाजिक तथा राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना।
 3 )शिक्षा द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास करना 
4)शिक्षा द्वारा राष्ट्र का आधुनिकीकरण करना।
 5 )शिक्षा द्वारा सामाजिक नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना।


केंद्र में राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा बोर्ड का और भारतीय शिक्षा सेवा का गठन किया जाए ।

प्रत्येक राज्य में राज्य विद्यालय शिक्षा बोर्ड और राज्य शिक्षा सेवा का गठन किया जाए ।

वरिष्ठ विश्वविद्यालयों की स्थापना का सुझाव दिया।


संशोधित त्रिभाषा सूत्र दिया-
 1) मातृभाषा ( क्षेत्रीय भाषा अथवा प्रादेशिक भाषा) 
2 ) संघ की भाषा हिंदी अथवा अंग्रेजी 
3) कोई आधुनिक भारतीय भाषा या कोई आधुनिक यूरोपीय भाषा या कोई शास्त्रीय भाषा जो प्रथम दो में न ले गई हो।

सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष स्वस्थ एवं कर्मठ व्यक्तियों की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष बढ़ाई जा सकती है।


 व्यक्तिगत ट्यूशन पर नियंत्रण किया जाए।


प्राथमिक शिक्षकों के प्रशिक्षण की अवधि 2 वर्ष होनी चाहिए और माध्यमिक शिक्षकों के प्रशिक्षण की अवधि फिलहाल 1 वर्ष रहे किंतु आगे चलकर इसे भी 2 वर्ष कर देना चाहिए।

 1 वर्ष में कार्य दिवसों की संख्या कम से कम 230 दिन हो।


 केंद्र में राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड राज्य में राज्य प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड की स्थापना की जानी चाहिए 15 से 30 आयु वर्ग के निरक्षर प्रोढो की शिक्षा व्यवस्था के लिए प्राथमिक विद्यालयों को सामुदायिक से केंद्र बनाया जाना चाहिए।

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Tuesday, January 5, 2021

माध्यमिक शिक्षा आयोग मुदालियर कमीशन 1952-53 SECONDARY EDUCATION COMMISSION



केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने 1951 में केंद्र सरकार के सामने माध्यमिक शिक्षा आयोग की नियुक्ति का प्रस्ताव रखा।


 माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन 23 September 1952

आयोग के अध्यक्ष मद्रास विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ0 लक्ष्मणस्वामी मुदालियर।

अध्यक्ष सहित कुल सदस्य 10।
 अन्य प्रमुख सदस्य- 
डॉ0 के0एन0श्रीमाली 
श्री के0जी0 सैयदेन 
श्रीमती हंसा मेहता 
श्री जॉन क्राइस्ट 
श्री कैथन रस्ट विलियम्स

आयोग ने रिपोर्ट प्रस्तुत की 29 अगस्त 1953


आयोग की नियुक्ति का उद्देश्य तत्कालीन माध्यमिक शिक्षा की स्थिति का पता लगाना और पुनर्गठन के संबंध में सुझाव देना।


माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्य -
जनतांत्रिक नागरिकता का विकास
 व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास 
व्यवसायिक कुशलता में वृद्धि और नेतृत्व विकास।

 माध्यमिक शिक्षा आयोग ने सुझाव दिया कि केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की तरह प्रत्येक प्रांत में प्रांतीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की स्थापना की जाए ।

प्रत्येक प्रांत में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का गठन किया जाए जिसके पदेन अध्यक्ष शिक्षा निदेशक(कार्य - शिक्षा मंत्री को सलाह देना) होंगे।


तकनीकी शिक्षा के लिए प्रत्येक प्रान्त में तकनीकी शिक्षा बोर्ड स्थापित किया जाए जो All india council for technical education के निर्देशन में कार्य करे।



वित्त व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रांतीय सरकारों की परंतु केन्द्र सरकार को मदद करनी चाहिए ।


माध्यमिक स्कूलों को दिया जाने वाला दान आयकर से मुक्त होगा भूमि की नि:शुल्क व्यवस्था।

तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था के लिए उद्योगों पर कर लगाया जाए ।


 प्रत्येक विद्यालय में निश्चित समय अन्तराल  से निरीक्षण होना चाहिए निरीक्षण मंडल में विद्यालयों के निरीक्षक, माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य , शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों के अनुभवी अध्यापक।

माध्यमिक शिक्षा 11 से 17 वर्ष के बालक बालिकाओं के लिए 3 वर्ष निम्न माध्यमिक 4 वर्ष उच्च माध्यमिक की कक्षायें चलेंगी।

इण्टरमीडिए को समाप्त कर 11 वीं को माध्यमिक 12 वीं को डिग्री में जोड़ दिया जाए । डिग्री कोर्स 3 वर्ष का होगा।


बहुउद्देशीय विद्यालय खोले जायेंगे।

निवास विद्यालयों की व्यवस्था। छात्राओं के लिए गृहविज्ञान के अध्ययन की सुविधा की जाएगी ।

बड़े शहरों में पोलीटेक्नीक खोले जाएं ।


ग्रामों में स्थापित माध्यमिक विद्यालयों में कृषि शिक्षा के साथ पशुपालन बागवानी तथा कुटीर उद्योगों की शिक्षा दी जानी चाहिए ।


प्रत्येक राज्य में दृष्टिहीन बाधिर तथा मूक आदि बाधितों की  शिक्षा का प्रबंध किया जाना चाहिए ।


मूल्यांकन अंकों में नहीं बल्कि ग्रेड सिस्टम होना चाहिए । वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं की व्यवस्था।

अनुशासन के लिए 17 वर्ष से कम आयु के बालकों को राजनीति में भाग लेने नहीं दिया जाएगा ।


आवश्यकतानुसार बालिका विद्यालय खोले जाएं जहाँ सम्भव न हो सह शिक्षा की व्यवस्था की जाए । बालिकाओं को किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने का समान अधिकार ।


नैतिक और धार्मिक शिक्षा अध्ययन से पूर्व या बाद में किसी को बाध्य न किया जाए ।

मिडिल स्चूलों में कम से कम दो भाषाओं की शिक्षा शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या प्रादेशिक भाषा । अंग्रेजी अनिवार्य विषय रहने दिया जाए । हिन्दी अनिवार्य विषय बनाया जाए ।


कार्यदिवस 200 तथा 2 माह का ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन अवकाश।


शिक्षकों की शिकायतों पर विचार के लिए आर्बिटेशन बोर्ड बनाया जाए।

सेवानिवृति आयु 58 के स्थान पर 60 कर दी जाए।


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Monday, January 4, 2021

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948 -49) Radhakrishnan Commission University Education Commission


स्वतंत्र भारत का पहला शिक्षा आयोग - विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग।


विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के निर्माण का सुझाव  भारत सरकार को केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड और अंतर्विश्वविद्यालय शिक्षा परिषद के द्वारा दिया गया।

 विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की नियुक्ति-4 नवंबर 1948


आयोग के अध्यक्ष डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन।

 कुल 10 सदस्य -

डॉ0 लक्ष्मणस्वामी मुदालियर 
आर्थर मॉर्गन
डॉ0 सर जेम्स 
 डॉक्टर जान टिजर्ट 
डॉक्टर जाकिर हुसैन
 डॉक्टर ताराचंद
 डॉक्टर मेघनाथ साहा 
 डॉक्टर कर्म नारायण बहल
 श्री निर्मल कुमार सिद्धांत आयोग के सचिव

 
रिपोर्ट प्रस्तुत की 25 अगस्त 1949।

 विश्वविद्यालय शिक्षा का उद्देश्य-
 युवकों में नेतृत्व क्षमता का विकास
 जनतांत्रिक सफल प्रणाली
 विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार 

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने सुझाव दिया कि शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा जाए ।
(शिक्षा को समवर्ती सूची में 42 वें संविधान संशोधन के तहत 1976 में रखा गया) 

वित्तीय भार केंद्र और प्रांतीय सरकारें दोनों मिलकर उठाएंगे।


 विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने  महत्वपूर्ण सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय अनुदान समिति के स्थान पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यूजीसी का गठन किया जाएगा।
(UGC की स्थापना 1953 में हुई और इसको 1956 में स्वायत्त संस्था का दर्जा दिया गया ।)

 विश्वविद्यालय का संगठन-
स्नातक (graduation)3 वर्ष का 
स्नातकोत्तर( post graduation)2 वर्ष का 
अनुसंधान न्यूनतम 2 वर्ष का होगा।


तीन वर्ग -
कला,विज्ञान और व्यवसायिक तकनीकी ।


ग्रामीण विश्वविद्यालय खोलने की सिफारिश की गई साथ ही उच्च शिक्षा और शोध कार्य के लिए कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना की बात कही गई ।




व्यवसायिक एवं तकनीकी शिक्षा के 6 वर्ग -
कृषि
वाणिज्य
इंजीनियरिंग एवं तकनीकी
चिकित्सा
कानून 
शिक्षक प्रशिक्षण 



पाठ्यक्रम में व्यापकता और लचीलापन लाने की बात की गई।

 स्त्री शिक्षा के लिए सह शिक्षा को प्रोत्साहन देने की बात कही गई और स्त्रियों के लिए स्त्री उचित शिक्षा की बात कही गई।

 ग्रामीण विश्वविद्यालय की बात की गई तठा अखिल भारतीय स्तर पर एक ग्रामीण शिक्षा परिषद की स्थापना ।


छात्र कल्याण के लिए प्रॉक्टोरियल बोर्ड प्रशासन में प्रशिक्षण की स्थापना की बात कही गई।


 प्राथमिक माध्यमिक और उच्च शिक्षा में कृषि को एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

 कृषि स्कूल कॉलेज तथा फॉर्म ग्रामीण अंचलों में खोले जाने चाहिए।


चिकित्सा शिक्षा के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षण होना चाहिए अधिकतम छात्र संख्या 100 और प्रत्येक छात्र के लिए 10 रोगी होने चाहिए ।


मूल्यांकन और परीक्षा के लिए परीक्षा को 5 वर्ष का अनुभव होना चाहिए।

 स्नातकोत्तर एवं व्यवसायिक परीक्षा में मौखिक परीक्षा का आयोजन भी किया जाना चाहिए।

 इसके लिए मूल्यांकन के लिए 3 सदस्य एक पूर्णकालिक बोर्ड की स्थापना का सुझाव दिया साथ ही वस्तुनिष्तठ  परीक्षाएं और पाठ्यक्रम में संशोधन की बात कही गई।

कार्य दिवस 180 होना चाहिए जो कि परीक्षा को छोड़कर होने चाहिए ।

विश्व विद्यालयों में विद्यार्थियों की अधिकतम संख्या 3000 और संबंध कॉलेजों में 1500 से अधिक नहीं होना चाहिए।


 विश्वविद्यालय में 18 वर्ष की आयु हो जाने पर ही प्रवेश दिया जाना चाहिए।

मूल्यांकन की श्रेणियां प्रथम श्रेणी 70% द्वितीय श्रेणी 55% और तृतीय श्रेणी 40% निर्धारित होनी चाहिए।

शिक्षकों की 4 श्रेणियाँ-
प्रोफेसर
रीडर
लेक्चरार
इंस्ट्रक्टर 

अध्यापकों व अधिकारियों में विवाद सुलझाने के लिए न्यायधीश की नियुक्ति।

सेवानिवृति आयु-60/64

अध्ययन के लिए अवकाश 1 बार में 1 वर्ष और पूरे सेवाकाल में 3 वर्ष।

अध्यापन कार्य सप्ताह में अधिकतम् 18 घण्टे।

ग्रामीण उच्च शिक्षा समिति की स्थापना- 1954

NSS की स्थापना 24 सितम्बर 1969

NCC  की स्थापना 16 जुलाई 1948

 
देश का प्रथम ग्रामीण विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश 1991 में स्थापित किया गया - महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय।


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धन्यवाद।।









Friday, September 25, 2020

नई शिक्षा नीति 2020 : समतामूलक और समावेशी शिक्षा के प्रावधान


नई शिक्षा नीति 2020 में समतामूलक और समावेशी शिक्षा : सभी के लिए अधिगम विषय को समझने के उद्देश्य से जिला  शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान  रतूड़ा रुद्रप्रयाग द्वारा नई शिक्षा नीति 2020 पर चर्चा के लिए राज्य स्तरीय वेबीनार  निदेशक एआरटी उत्तराखंड  श्रीमती सीमा जौनसारी के  निर्देशन एवं  डायट प्राचार्य श्री एस0 एस0 असवाल जी  के मार्गदर्शन मेें  23 सितम्बर 2020 को आयोजित किया गया।

                        श्रीमती सीमा जौनसारी 
               निदेशक अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण

वेबिनार में राज्य भर से कुल 524 विशेषज्ञों,शिक्षकों ने प्रतिभाग किया।  वेबीनार का संचालन डायट रतूड़ा की वरिष्ठ प्रवक्ता श्रीमती भुवनेश्वरी चंदानी जी द्वारा किया गया।

जिसके संयोजक डॉ0 विनोद कुमार यादव, श्रीमती भुवनेश्वरी चंदानी, डॉ0 जी0 पी0 सती थे।  
जिसमें  पूरे देश भर से गणमान्य व्यक्ति जुड़े जिनमें से डॉ0 पंकज सिंह एसोसिएट प्रोफेसर दीनबंधु कॉलेज यूनिवर्सिटी दिल्ली जो की प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी हैं जो अंटार्कटिका मिशन पर भारत की तरफ से रहे, डॉ0 विनोद नौटियाल, योग विभाग एचएनबी केन्द्रीय विश्वविद्यालय , डॉ0 हेमलता यादव बी एम कॉलेज इंदौर HOD एजुकेशन डिपार्टमेंट सहित कई गणमान्य  व्यक्तियों की गरिमामय उपस्थिति रही।

सर्वप्रथम  श्रीमती भुवनेश्वरी चंदानी के द्वारा सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का परिचय कराया गया और कार्यक्रम की रूप रेखा प्रस्तुत की गई।
तत्पश्चात आमंत्रित किया गया प्राचार्य डायट रतूडा जिन्होंने सभी अतिथियों का स्वागत और अभिनंदन किया।
श्री 0 एस0 एस0 असवाल  डायट प्राचार्य रतूड़ा रुद्रप्रयाग 




  कार्यक्रम की रूपरेखा-




श्रीमती सीमा जौनसारी  निदेशक अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण उत्तराखंड देहरादून के द्वारा सभी को संबोधित करते हुए अपने विचार रखे गए और सभी को उत्तराखंड सरकार के प्रयासों से परिचित कराया।
जौनसारी मैम ने बताया कि समाज में बालक और बालिकाओं के बीच बहुत ज्यादा भेदभाव है।इसके लिए एक अवेयरनेस कैंपेन चलाने की आवश्यकता है।

 जैसा कि साक्षरता के बारे में सभी जानते हैं कि उत्तराखंड देश में तीसरे स्थान पर है जो कि राज्य के लिए बहुत ही गौरव का विषय है।
 इसके अलावा बालिका और बालकों  के बीच होने वाले लिंग भेद दूर करने  के लिए उत्तराखंड राज्य में कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय  वह बहुत ही कारगर भूमिका  निभा रहे हैं ।
 यहां पर जो हॉस्टल हैं उनकी स्थिति बहुत अच्छी है इनमें  से अधिकतम हॉस्टलों में 100 % बालिकाओं के प्रवेश  हैं ।
 12 वीं तक बालिका शिक्षा को लेकर कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में बहुत ही बेहतरीन कार्य हो रहा है ।यहां से बालिकाएं विभिन्न प्रतियोगिताओं में  प्रतिभाग करती हैं और स्थान प्राप्त भी करती हैं जो कि पूरे राज्य भर के लिए गौरव का विषय है।  इस तरह से उन्होंने
समानता और समता को लेकर अपने विचार प्रकट किए।

इसके पश्चात्  प्रोफेसर अमरेंद्र प्रसाद बेहरा जी, संयुक्त निदेशक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद नई दिल्ली द्वारा नई शिक्षा नीति 2020 के 27 चैप्टर में से अध्याय 6 की  विस्तृत चर्चा की।
           प्रो0 अमरेंद्र प्रसाद बेहरा संयुक्त निदेशक
                           NCERT Delhi

समता और समानता पर दिव्यांग बच्चों,लिंग असमानता ,संस्कृति से जुड़े परिचय और भौगोलिक परिचय को लेकर उन्होंने विस्तार से अपने विचार रखे ।
इसके अलावा  सोशियो इकोनामिक कंडीशन के तहत जो बच्चे आते हैं और जिन बच्चों को चुराकर ले जा लिया जाता है, जो भीख मांगने वाले बच्चे हैं ,अनाथ बच्चे हैं इन सभी के बारे में शिक्षा नीति किस तरह से संवेदनशील है और उनको मुख्यधारा में लाने का प्रयास है इस पर उन्होंने बात रखी।
 
SEDGs की समस्याओं को समझा जा सके और और हायर एजुकेशन तक उनका ध्यान दिया जा सके। इसके लिए जो स्पेशल एजुकेशन जोन है वहां के बच्चों के लिए उनके समय के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था  की जाए और  इसके अलावा बच्चों के लिए स्कॉलरशिप की बात शिक्षा नीति में की गई है।

 उनके लिए काउंसलिंग की विशेष व्यवस्था की गई है और उत्तराखंड में कस्तूरबा गांधी विद्यालय जिसमें 
उत्तराखंड में एक बेहतरीन कार्य किया जा रहा है,उस पर उन्होंने सभी को बधाई दी ।

उन्होंने कहा कि इसी प्रकार से कस्तूरबा गांधी और नवोदय विद्यालयों का विस्तार किया जाएगा ।मुख्य रूप से यह स्पेशल एजुकेशन जोन में होंगे जहां पर बच्चों को इतनी अच्छी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाती हैं इसके अलावा आदिवासी क्षेत्रों में भी बच्चों का ध्यान रखा जाएगा।
बच्चों का शिक्षण अधिगम स्तर एक जैसा हो उनकी विभिन्नता इसमें आगे ना आए इसके लिए विशेष प्रयास किए जाएंगे ।
समानता का अधिकार की बात उन्होंने कही और साथ ही  बालिकाओं की शिक्षा के लिए एक विशेष व्यवस्था की बात की।
  
दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष टेक्नॉलोजी और डिवाइस उपलब्ध हों।उनके लिए ऑडियो विजुअल ऐड्स  विद्यालय में उपलब्ध  हों।
 प्रत्येक वर्ष 50 घंटे शिक्षकों को अनिवार्य रूप से
 प्रशिक्षण दिया जाएगा। 
चैप्टर 23 और 24 की बात उन्होंने की जिसमें तकनीकी शिक्षा का समावेश ऑनलाइन डिजिटल  माध्यम का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो ।

पहाड़ों में जिस प्रकार से कनेक्टिविटी की दिक्कत होती है उसकी उसके लिए रेडियो और टीवी एक बेहतरीन विकल्प है  जिसकी पहुंच लगभग सभी 
तक है।

इसमें उन्होंने कहा कि नेशनल टेक्नोलॉजी एजुकेशन फोरम की बात नई शिक्षा नीति में की गई है जो राज्य सरकार को गाइड करेगी कि  किस प्रकार से टेक्नोलॉजी प्रत्येक बच्चे को मदद कर सके ।

डिजिटल लिटरेसी के इस्तेमाल के बारे मेे बातचीत की जिससे बच्चा सेल्फ लअर्नर बन सके और प्रॉब्लम सॉल्वर बन सके व 21वीं सदी की कौशलों को प्राप्त कर सके। 
सभी मिलकर समेकित शिक्षा की ओर चलें । प्रधानमंत्री जी  स्किल , स्केल ,स्पीड की बात करते हैं  जिसमें कौशल विकास और वह भी बड़े पैमाने पर और रफ्तार के साथ किया जाए इस पर उन्होंने बात रखी। 

 निष्ठा कार्यक्रम में जिस प्रकार से उत्तराखंड में बढ़-चढ़कर भाग लिया गया है उसके लिए बधाई दी साथ ही आगे भी इस प्रकार के कार्यक्रमों को प्रचारित और प्रसारित करने के लिए सभी को प्रोत्साहित किया।

इस प्रकार से नई शिक्षा नीति के कई पहलुओं को उन्होंने विस्तार से बताया और और सभी को इसे समझने में मदद मिली।


      डॉ0 गुरु प्रसाद सती तकनीकी सहायक डायट रतूड़ा 


इसके पश्चात् रतूडा से डॉ0 गुरुप्रसाद सती जी द्वारा शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला गया और साथ ही समावेशी शिक्षा को किस प्रकार से राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने अध्याय 6 के तहत महत्व दिया है इस पर बातचीत की। समतामूलक और समावेशी शिक्षा के 20 बिंदुओं को सती जी द्वारा विस्तार से समझाया गया। 
नई शिक्षा नीति 2020👈 विस्तार सेे जानें।


कार्यक्रम में आगे मुख्य वक्ता डॉ0 भारती   Associate professor DEGSN, CIET-NCERT ने 
डॉ0 भारती   Associate professor DEGSN, CIET-NCERT

समता मूलक और समावेशी शिक्षा को विस्तार से समझाते हुए बताया कि इसका सर्वप्रथम उदाहरण भारतीय इतिहास में यदि देखा जाए तो पंचतंत्र की कहानियां हैं।

 उनसे इस समतामूलक और समावेशी शिक्षा की अवधारणा स्पष्ट होती प्रतीत होती है,जहां पर  राजा के बच्चों को मंदबुद्धि होने के कारण होने के कारण ज्ञान नहीं दे पा रहे थे तो उनके लिए राजा ने एक ज्ञानी पंडित रखा जिसने पंचतंत्र की कहानियां गड़ी । जिसमें उनकी रुचिओं का ध्यान रखा गया और उनकी रुचि को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम निर्मित किया गया।


 उसके बाद उन्होंने बहुत ही अच्छे से समावेशन और समानता और समता  में  अंतर को स्पष्ट किया।समानता का मतलब सब को एक नजर से देखना जबकि  समता का मतलब है पहले बच्चे की जरूरत को समझते हुए समभाव के साथ देखना।

 इसमें उन्होंने उदाहरण देते हुए बहुत अच्छे से बताया कि जैसे सरकारी विद्यालय में यूनिफार्म, टेक्सबुक और एडमिशन देते हुए सभी को समानता के भाव से देखा जाता है किंतु यदि हम बात करें विशेष आवश्यकताओं आवश्यकता वाले बच्चे की उनके लिए उसका क्या महत्व है, यह ध्यान रखना जरूरी है। 
वहां पर उनके लिए ऑडियोबुक या फिर ब्रेल लिपि में से संबंधित कुछ पुस्तकें होनी चाहिए।

   उन्होंने बताया कि जो है उसका समावेशी होना बहुत जरूरी है इसका मतलब  विद्यार्थी स्कूल में आए तो उसको वहां पर अपनापन महसूस हो।

उसको लगे मेरी परंपरा से जुड़ा है , मेरे घर जैसा है और यह विद्यालय मेरे लिए ही बना है उसका इंफ्रास्ट्रक्चर उनके अनुरूप हो।

समावेशी शिक्षा समय की सीमा से परे है। जिस पर निरंतर काम करते रहना है। सभी को सामान्य शालाओं  में लाना सिर्फ हमारा मकसद नहीं होना चाहिए ।
हम बच्चे को स्कूल तक ले आए उसके बाद  वहां से हमारा काम शुरू होता है कि उनके लिए शिक्षण अधिगम की व्यवस्था में उनका प्रतिभाग सुनिश्चित हो।

समावेशन तब होता है जब हम प्रत्येक की जरूरत के अनुसार अपने इंफ्रास्ट्रक्चर में परिवर्तन करें, अपनी व्यवस्था में बदलाव करें।
जैसे दिव्यांग बच्चों के लिए क्या हमारे पास शौचालय हैं यदि उनको कोई दिक्कत होती है तो क्या वहां पर अलार्म की व्यवस्था है ? लाइब्रेरी में ऑडियो बुक्स और साइन लैंग्वेज या फिर ब्रेल लिपि की व्यवस्था हो तो तभी हम समावेशी शिक्षा की बात कर सकते हैं।
दिव्यांगजन अधिनियम अधिकार 2016 के बारे में उन्होंने विस्तार से बताया और इसमें स्वीकृत 21 अक्षमताओं के बारे में बात की। 
 ऑटिज्म (स्वलीनता) जो सामान्य शालाओं में पढ़ने वाले बच्चों में पाई जाती है किंतु हम उसको पहचान नहीं पाते क्योंकि उसको हम प्रत्यक्ष रुप से देख नहीं सकते।
 विशेषकर यह देखा गया है कि जिन बच्चों को सुनने में दिक्कत होती है वह उनको चलने में भी दिक्कत होती है तो कई ऐसे ही ऐसी अक्षमताएं हैं जिनको हम आसानी से पहचान सकते हैं।

स्वलीनता को इस तरह से नहीं पहचाना जा सकता।ऐसे बच्चे अपने आप में ही लीन होते हैं उनको उनके नाम लेकर बुलाने की जरूरत होती है ।

उसके अलावा उन्होंने एक और पहचान बताई कि ऐसे बच्चे आपकी बात सुनते हुए भी कही और देख रहे होंगे  ऐसे 
हम उनको पहचान सकते हैं।
 इसके अलावा उन्होंने डिस्लेक्सिया, डिस्केलकुलिया के बारे में बात की।
समवेशी शिक्षा के लिए बच्चों का अपने विद्यालय में स्वागत करना होगा। विशेष शिक्षक के बारे में उन्होंने बताया कि प्रत्येक विद्यालय में नहीं हो सकते किन्तु वे शिक्षकों के हाथ जरूर मजबूत कर सकते हैं।
उनको इन सबकी जानकारी और प्रशिक्षण दिया जा सकता है ताकि एक सामान्य शिक्षक अक्षमताओं वाले  बच्चों को साथ लेकर चले और उनकी अक्षमताओं को अच्छे से समझ पाए और उनके लिए उचित व्यवस्था कर पाए।

शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम को समावेशी शिक्षा की व्यवस्था में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। 
नई शिक्षा नीति 2020 के हर अध्याय में समावेशी शिक्षा की बात की गई है। आंगनबाड़ी से हायर एजुकेशन समानता की बात की गई है।

 जहां तक हम कस्तूरबा गांधी विद्यालयों की बात करते हैं वहां पर इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यवस्था में बदलाव किए जाने जरूरी हैं जो समावेशी शिक्षा की तरफ अपना ध्यान दे सकें ।
 यह मैंटीनेंस के दौरान भी यह ध्यान दिया जा सकता है । एक विशेष बात उन्होंने लिंग आधारित पहचान के बारे में कही लिंग असमानता को हम सिर्फ लड़कियों को लेकर सोचते हैं लड़कों के लिए भी उतना ही यह जरूरी है कि हम उनको लेकर भी लिंग असमानता को समझें।

इसके बाद मुख्य वक्ता डॉ0 नीमिरत कौर Associate professor अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी बेंगलूरु द्वारा समतामूलक और समावेशी शिक्षा को शिक्षा का आधार बताया इसी कारण से इसका उल्लेख हर अध्याय मे किया गया है।
डॉ0 नीमिरत कौर एसोसिएट प्रोफेसर APF यूनिवर्सिटी

इसके बाद एक के बाद बिन्दु को डॉ0 कौर जी द्वारा स्पष्ट किया गया।
1.  नीति के आधार सिद्धांतों को समझाया गया कि इसका उददेश्य ऐसे इंसानों का विकास है जो संविधान द्वारा परिकल्पित समाज के निर्माण में सहयोग करें।


2. डॉ0 कौर द्वारा स्पष्ट किया गया कि सामाजिक आर्थिक रूप से वंचित वर्ग को 5 प्रकार वर्गीकृत किया गया है-
 1.लिंग पहचान 
2.सामाजिक सांस्कृतिक पहचान
 3.भौगोलिक पहचान 
4.विशेष आवश्यकता वाले बच्चे
 5.सामाजिक आर्थिक स्थिति


3. सभी के लिए समावेशी शिक्षा पर बात करते हुए उन्होने बताया कि 2030 तक यह लक्ष्य रखा गया है कि चार करोड़ नये विद्यार्थी शैक्षणिक संस्थानों में नामांकित हों।
 SEDG का नामांकन 50% तक पहुँच सके जिसके अंतर्गत उच्च गुणवत्ता वाली ईसीसीई  की सार्वभौमिक पहुंच, बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान, ड्रॉपआउट कम और हर स्तर पर सार्वभौमिक  पहुंच की बात की गई।



देशभर में  सफल नीतियों और योजनाओं को मजबूत किया जाए इस पर उन्होंने अपने विचार रखते हुए बताया कि से सहपाठी शिक्षक, ओपन विद्यालय शिक्षा तथा उचित बुनियादी ढांचा उपयुक्त अपने विद्यालय में काउंसलर और सामाजिक कार्यकर्ताओं का सहयोग लिया जायेगा।
परिवहन के लिए साइकिल और साइकिल पैदल समूह का गठन इसके साथ ही लक्षित छात्रवृत्ति और नगद हस्तांतरण की व्यवस्था की बात शिक्षा नीति के तहत की गई है।

 SEDGs की बड़ी आबादी वाले क्षेत्रों को विशेष शिक्षा क्षेत्र घोषित किया जाएगा। जिसमें उनके बचपन से ही मूलभूत साक्षरता संख्या,पहुंच, नामांकन और उपस्थिति के बारे में महत्वपूर्ण सिफारिशें और ठोस तरीके से उन्हें लक्षित किया जाएगा।
 इनकी उपस्थिति और सीखने के परिणामों को बढ़ाने  के लिए काउंसलर की व्यवस्था होगी और इन क्षेत्रों में प्रतिभाशाली और मेधावी छात्र छात्राओं के लिए विशेष छात्रावास, ब्रिज पाठ्यक्रम, फीस माफ छात्रवृत्ति से वित्तीय सहायता की व्यवस्था की जाएगी ।
अतिरिक्त स्कूलों में ऐसे जिलों में जवाहर नवोदय विद्यालय और केंद्रीय विद्यालय खोले जाएंगे ।
इनकी सीखने के परिणामों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा और पहुंच से संबंधित सामान समस्याओं के लिए वोकेशनल एजुकेशन की व्यवस्था रहेगी डॉ0 कौर ने इस तरफ भी प्रकाश डाला।


समतामूलक और समावेशी शिक्षा में लिंग को लेकर विशेष रूप से बात की गई है लड़कियों और ट्रांसजेंडर छात्रों की पहुंच विद्यालय तक हो।
 जेंडर गैप को कम किया जाए सभी को समान अवसर दिए जाएं लड़कियों को स्कूल में रखने पर खास ध्यान दिया जाए जिसके लिए उनकी सुरक्षा और अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए।
 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों को मजबूत किया जाएगा और इन्हें बारहवीं तक बढ़ाया जाएगा जैसा कि सीमा जौनसारी मैम ने कहा कि उत्तराखंड में पहले यह 12वीं तक चल रही है।
 लिंग संवेदनशीलता पर बात की जाएगी और उसको पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाया जाएगा केंद्र में नीतियों और योजनाओं को विशेष रूप से केंद्रित करने पर रहेगा।


 डॉ0 निमिरत कौर ने समावेशी शिक्षा के लिए विशेष रुप से ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया कि  बच्चे नेशनल करिकुलम फ्रेम फ़ोर सैकेण्डरी एजुकेशन  से जुड़ाव महसूस करें।
  बोर्ड परीक्षा,NTA टेस्ट में बैठने और उच्च शिक्षा से जुड़ने के लिए सभी को प्रोत्साहित किया जाना बहुत आवश्यक है जिसकी NEP 2020 में बात की गई है।
 इसके अलावा वैकल्पिक विद्यालयों की व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे इन सब विविधताओं  के साथ ही सभी बच्चे मुख्यधारा से जुड़ पाए
 मुख्यधारा से जुड़ने के लिए उनके लिए वित्तीय व्यवस्था, शिक्षक और आधारभूत सुविधाओं की बात कही गई है और इसके अलावा किसी भी प्रकार की सुविधा के लिए स्कॉलरशिप और अन्य अवसरों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम तैयार किया जाएगा।

जैसा कि पहले भी बताया गया था कि सिर्फ बच्चों को विद्यालय तक लाना शिक्षा नीति के महत्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करता। उसके पश्चात स्कूली स्तर पर एक अनुकूल संस्कृति निर्माण बहुत आवश्यक है।

 स्कूल पाठ्यचर्या में मानवीय मूल्यों और विविधताओं का सम्मान किया जाना चाहिए और सभी के प्रति संवेदनशीलता का विकास किया जाना जरूरी है।

 मुख्य रूप से SEDGs  के लिए सामान्य बालक संवेदनशील हों।

 परस्पर सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार किया जाए इसके लिए प्रयास किए जाएंगे।

 शिक्षक शिक्षा में समावेशन और क्षमता मुख्य पहलू होगा पूर्वाग्रह को दूर कर किया जाना चाहिए और सभी धर्म और संस्कृतियों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए।


 इसके अलावा डॉ0 कौर द्वारा नई शिक्षा नीति 2020 में समतामूलक तथा समावेशी शिक्षा से संबंधित सभी बिंदुओं पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई।

इसके पश्चात् समूह द्वारा कई प्रश्न साझा किये गए जिनका डॉ 0 नीमिरत कौर द्वारा सभी के संतोषजनक जवाब दिये गये।

1. मानसिक विकलांग बच्चों के खाते आसानी से नही खुल पाते है , जिससे छात्रवृत्ति प्राप्त करने मे समस्या होती है ।कृपया समाधान बताएं। ।।
2. कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों को फेल करने की व्यवस्था क्या है इस नई शिक्षा नीति में, कृपया स्पष्ट करने की कृपा करें।
3. सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या है कि बच्चे स्कूल नहीं आते है उनको स्कूल लाने के लिए Education Policy 2020 में क्या व्यवस्था है?
4. Early Childhood care and educationका कैरिकुलम किस प्रकार का होगा और इसका आधार क्या होगा??
5. मानसिक विकलांग बच्चों के खाते आसानी से नही खुल पाते है , जिससे छात्रवृत्ति प्राप्त करने मे समस्या होती है ।कृपया समाधान बताएं। ।।
6. disabled छात्रों का मूल्यांकन किस प्रकार से हो?
7. क्या पूरे देश में एक राष्ट्र एक शिक्षा नीति हो पाएगी?
8. शिक्षण प्रक्रिया में समावेशन की अधिक से अधिक स्थान देने के लिए रिसोर्स शिक्षक, काउंसलर,मनोवैज्ञानिक और अन्य विशेषज्ञों का अपना महत्व है।पिछले अनुभव बताते हैं कि बच्चों को इनका अधिक लाभ नहीं मिल पाया शायद इसका कारण आर्थिक तंगी भी हो सकती है। कुछ वैकल्पिक सुझाव जो कि अधिक से अधिक बच्चो को  लाभान्वित कर सकते है देने का कष्ट करें।



पूरे कार्यक्रम के दौरान ए0पी0एफ0 से श्री  दीपक रावत जी का महत्वपूर्ण तकनीकी सहयोग रहा।


इस तरह से डायट रतूडा में आयोजित इस वेबिनार से सभी लाभान्वित हुए और समतामूलक और समावेशी शिक्षा को समझने में मदद मिली।इसके लिए हम सभी गणमान्य अतिथिगणों,वक्ताओं एवं सम्मानित शिक्षक समाज का धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।
            समन्वयक वेबिनार डायट रतूड़ा रुद्रप्रयाग 

                                धन्यवाद!