Translate
Wednesday, August 12, 2020
ICT ONLINE WORKSHOP तीन दिवसीय कार्यशाला (11 अगस्त से 13 अगस्त तक)
Monday, July 27, 2020
गोल्डन कार्ड:राज्य सरकार स्वास्थ्य योजना
Wednesday, July 15, 2020
आनन्दम् पाठ्यचर्या:dream a dream foundation (एक मुलाकात)
आनन्दम पाठ्यचर्या की सहयोगी संस्था ड्रीम एंड ड्रीम द्वारा ऑनलाइन मीटिंग आयोजित की गई थी।इसकी जानकारी इमरान सर जो dream and dream foundation से हैं, के द्वारा दी गई थी। जिसमें सुचिता भट जो dream a dream foundation की सीईओ है, उनसे सर्वप्रथम परिचय हुआ जो लाइफ स्किल्स पर बहुत लंबे समय से काम कर रही है और विभिन्न देशों में काम कर रही हैं।
एक अलग अंदाज में परिचय-
उसके बाद स्वाती मैम ने अपना परिचय दिया और जो था वह बहुत ही रोचकता से शुरू होता है ।अपने नाम के आगे विशेषण लगाना था तो उन्होंने स्माइली स्वाती अपना परिचय दिया ।कुछ ऐसे थे आनंद भरी आनन्दी,पागल-परेशान पवन बहुत ही रोचक ...।
एक गतिविधि-
उसके बाद एक कागज पर अपने जीवन के चार पहलू शारीरिक,मानसिक,सन्वेगात्मक और आध्यात्मिक के चार कॉलम बनाने को कहा गया।प्रत्येक कॉलम में इस समय जो फील हो रहा था वो लिखना था,जो कुछ ऐसा था।
प्रत्येक भाव को अब 1-10 के बीच no देना था।किस भाव की मात्रा कितनी है जिससे प्रत्येक लाईन पर एक-एक डॉट बन गया।वो डॉट कनेक्ट करने को कहा गया।मेरे भावों का डॉट कुछ ऐसा था।
इसके बाद इसको एक अलग पेज पर बनाने को कहा गया जिसमें सबके बहुत सुन्दर मनो भाव स्पष्ट निकलकर आ रहे थे।किसी की बटरफ्लाई बनी थी। किसी किसी ने पत्थर बनाया था और किसी का स्टारफिश था तो हर किसी ने अलग तरीके से उसको प्रतिबिंबित किया था। अपने भावों को प्रतिबिंबित किया था अब उस कैरेक्टर को उसका नाम पूछना था ।उसमें अपने भाव ढूंढने थे और उससे बातचीत करनी थी। मेरा केरेक्टर कुछ ऐसा बना।जो चित्र बना था उसमें सभी साथी अपने मनोभावों को कागज पर उतरा हुआ देख पा रहे थे।
चित्र को पत्र -
अब तीन प्रश्नो पर विचार करते हुए अपने चित्र के लिए पत्र लिखना था ।प्रश्न कुछ ऐसे थे-
1. ऐसा क्या है जो वाकई अभी सुनना चाहते हैं।
2.ऐसा क्या करें जो हम अपने अंदर से अपने को मजबूत महसूस करें और उसको बढ़ा सकें।
3.अभी हमारे जीवन में क्या मिसिंग है,क्या खोया हुआ है जो हमें वापस पाना है?
ये पत्र उस चित्र से अपने से बातचीत करनी थी, उससे बातचीत करते उसको एक पत्र लिखना है। एक तरह से यह अपने आप से बातचीत थे। जो हम अक्सर समय नहीं निकाल पाते, हम दुनिया से बातचीत कर रहे होते हैं लेकिन स्वयं से हम बहुत कम ही बातचीत कर रहे थे और इस चित्र के माध्यम से यह बहुत अच्छे से उपाय और हम आसानी से अपने भावों को शब्दों में व्यक्त कर पाए। उसके बाद सभी साथियों ने अपने-अपने लेटर लिखे ।
फिर 3-3 के ग्रुप में सभी को ब्रेक आउट किया गया और वहां पर तीन- तीन लोग एक रूम में कनेक्ट हुए जिसमें 3 लोग आसानी से एक दूसरे से बातचीत कर पाए जो मेरा ग्रुप था। उसमें थे बागेश्वर डाइट से संदीप कुमार जोशी जी और दूसरी मैम देहरादून से थी ।संदीप संदीप कुमार ने बताया कि मैं चाहता हूं कि तुरंत पूरी दुनिया कोरोना से मुक्त हो जाए। दूसरा जो उन्होंने सवाल का जवाब था कि क्षेत्र में कुछ काम करना चाहते हैं और अपने संपर्क में आने वाले बच्चों को और सहयोगियों के साथ सहयोगी की भूमिका निभाना चाहते हैं। तीसरा जो उनको लगता है कि उनको लाइफ में वह बातचीत के माध्यम से निकाल पाए। वह था एक काम को शुरू करता हूं तो पूरा नहीं कर पाता हूं तो वह चाहते हैं कि मैं कुछ काम करूं तो उसको पूरा कर पाऊँ।
नेगी मैम देहरादून से थी कुछ परेशान महसूस कर रही थी खुद को मजबूत करना चाहती हैं और अपनी लेखन प्रतिभा को दुनिया के सामने लाना जाती हैं। फिर से हम पुराने अपने सभी बड़े ग्रुप में कनेक्ट हो गए।जहाँ पवन सर अपने चित्र पिल्ली को दिखा रहे थे। जिस पर जो कुछ इस तरह से उस पर कविता लिखी थी,कुछ रास्ते अलग है तेरे,
पर हमको एक दूसरे की जरूरत है।........
.................
तुम भी बदलोगे या फिर से मुझे बदलना है।
डॉ 0 अमिता मैम का समझदार लब्बू, मनीषा मैम का लायन सभी खास थे।
शैल्जा मैम ने चिड़ियों की आवाज,बच्चों की आवाज के बारे में अपने चित्र से बात की। अपने चित्र को अपना डर भी बताया लोग क्या कहेंगे इस डर से डरती हूँ।
शायद उनके चित्र ने ये ही बोला होगा
जब लोग तुम्हारे खिलाफ बोलने लगे, तब समझ लो तुम तरक्की कर रहे हो।
उसके बाद अन्तिम गतिविधि खास थी जिसमें उस पत्र में जो लिखा था उसको पूरा होते देखना था ।वो चित्र हमारे मन का आइना हमको वो सब दे रहा था जो हमको चाहिये।यह एक पूर्णता का अहसास था।अद्भुत..........।
कोरोना काल में लिखी गयी तनुजा जोशी मैम की सकारात्मक कविता और उनकी सुन्दर आवाज ने सबको आनंद से भर दिया।
इस तरह दो घण्टे हो गये अपनो के साथ और अपने साथ समय हवा की तरह निकल गया ।जीवन के मीठे अनुभवों की खुशबू देकर।धन्यवाद सुचिता मैम,स्वाती मैम,इमरान सर ,पवन सर ,dream a dream की पूरी टीम और आनन्दम् पाठ्यचर्या................।
Saturday, June 27, 2020
वर्चुअल लैब द्वारा विज्ञान प्रशिक्षण
विज्ञान शिक्षकों के लिए एससीईआरटी द्वारा आयोजित वर्चुअल लैब के माध्यम से विज्ञान प्रशिक्षण 26 जून से 2 जुलाई तक की शुरुआत हुई।पहला दिन था और यह वर्चुअल लेब में विभाग द्वारा पहली बार ही हो रही थी तो उत्सुकता भी थी कि क्या होने वाला है? मैने रा0इ0का0 जयंती कोठियाड़ा में प्रतिभाग किया। तीन अन्य साथी वहां पर थे तो कुल मिलाकर 4 साथी। शुरुआत में कनेक्टिविटी में थोड़ी परेशानी हुई थी। दीपक बुटोला जी ने प्रयास करके यह समस्या किसी तरह दूर की। एस0सी0ई0आर0टी0 देहरादून से कार्यशाला की औपचारिक शुरुआत की गई।
डॉ0 प्रदीप रावत जी द्वारा ओपन एजुकेशन रिसोर्सेज के बारे में बताया गया जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी थी। इस कार्यशाला कि आज के दिन की सबसे उपयोगी जानकारी प्राप्त हुई,जो कि आपके साथ जरूर साझा करना चाहूंगी।
यूट्यूब आजकल ऑनलाइन एजुकेशन का प्रचलित माध्यम बना हुआ है, किंतु हम सभी जानते हैं, बच्चों के लिए भटकाव के लिए इसमें कितना कुछ है । जब बच्चे पढ़ने बैठते हैं तो सिर्फ पढ़ते रहे इसके लिए एक उपाय है-टेलीविजन।जिसके के माध्यम से स्वयं प्रभा चैनल पर हर विषय पर स्टडी मटेरियल उपलब्ध है जो कि बिल्कुल नि:शुल्क है।
1. गणित विज्ञान की बात करें तो DTH पर स्वयंप्रभा चैनल संख्या 27, 28 दसवीं कक्षा के विज्ञान विषय के लिए है।
• चैनल संख्या 31 पर NCERT का पूरा पाठ्यक्रम उपलब्ध है,जो कि विज्ञान और गणित विषय के लिए है। JEEE तथा NEET की तैयारी के लिए चैनल संख्या 19, 20 21 और 22 जो कि19 biology ,20-केमिस्ट्री, 21 गणित, 22 फिजिक्स के लिए है।
1. स्वयं प्रभा चैनल को इंटरनेट पर भी देखा जा सकता है जिसका लिंक। Www.nic.in है
2. लिंक पर क्लिक करते ही explore आयेगा फ़िर 32 चैनल की लिस्ट खुलेगी।
3. screen archive पर जाएँ , सभी स्टडी मटेरियल उपलब्ध है।किसी भी विषय पर भी विडियो देखा जा सकता है।
• दूसरा महत्वपूर्ण स्रोत है e-pathshala जो कि भारत सरकार की वेबसाइट है। जिस पर एनसीआरटी की बुक सीनियर सेकेंडरी तथा स्कूली शिक्षा के लिए उपलब्ध है।
• अगला स्रोत है Khan Academy स्कूली शिक्षा के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विभिन्न वीडियो उपलब्ध है।
• करोना के इस दौर में यह सोच सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन करते हुए पंचायत स्तर पर विद्यार्थियों के लिए लगाया जा सकता है। ऐसे सुझाव प्रस्तुत किया गया।
• इसके पश्चात डॉ0 मोहन सिंह बिष्ट जी द्वारा वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए तनाव प्रबंधन पर महत्वपूर्ण जानकारी दी गई। जिसे स्लाइड के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुतीकरण बहुत ही रोचक लगा और आसानी से समझने वाला भी था।
• साथ ही एक बात समझ में आई कि तनाव की बात ज्यादा देर तक की जाए तो तनाव उत्पन्न होने की प्रबल संभावना रहती है जो कि वर्तमान में देखा जा सकता था।
• अंत में चर्चित मुद्दे corona के बारे में बताया गया कि पिछले चार-पांच महीनों से जो जानकारी मिल रही है, वैसे ही थी।जो काफी विस्तार से समझाया गया। बहुत कुछ सीखने को मिला और कक्षा से पलायन के कारण भी समझ आया। 1:00 बजे समाप्त होने वाली कार्यशाला 2:15 तक समाप्त हुई और हम सभी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए मुंह पर मास्क लगाए वापस आ गए।
Monday, June 1, 2020
एक नई स्किल ::शुरुआती 20 घण्टे
अंत में काफी सोचने के बाद मैंने सोचा मैं स्केचिंग सीखूगी। बुक में दिए गए पांच सिद्धांतों पर विचार किया। स्केचिंग करनी थी साधन, सीमित पेंसिल और पेपर! पुस्तक में दिये गये 5 सिद्धांत यह थे-
1- लक्ष्य निर्धारण
2-स्किल को छोटे-छोटे कौशल में बांटना
3-जितनी जरुरत हो उतनी रिसर्च
4- रुकावटों को दूर करना
5-20 घंटे का अभ्यास।
पहले सिद्धांत लक्ष्य निर्धारण में हमें यह ध्यान देना होता है कि हमें क्यों सीखना है और कितना सीखना है? इन्हें किसी भी स्किल का बहुत विस्तार होता है। हमें उसमें से एक सीमा का निर्धारण करना होगा। जैसे अगर कोई गिटार बजाना सीखना चाहता है तो वह 4,5 सॉन्ग सेलेक्ट कर ले। जिन पर वह गिटार बजाना सीखेगा। और कितना और क्यों सीखना है? हमें क्या प्रोफेशनल प्रोफेशनल आर्टिस्ट बनना है या फिर हमें यह काम बस शौक के लिए करना है । हम अपने दोस्तों के साथ मौज मस्ती के लिए सीख रहे हैं।लक्ष्य निर्धारित करें। इससे किसी लक्ष्यों का निर्धारण कर सकते हैं। मैंने सोचा कि क्यों न मैं पोर्टरेट स्केचिंग करुँ। मैंने ज्यादा कुछ नहीं सोचा बस यह कि मैं इसको बस 20 घंटे करके देखती हूं। क्या पता यह सच में हो जाए?
2- स्किल को छोटी-छोटी सब स्किल में बांटना-
कोई भी जो कौशल होता है उसकी बहुत सारे कई कौशलों से मिलकर बना होता है।उसमें से कुछ कौशलों के द्वारा हम उस काम को आसानी से कर सकते हैं । उसके बाद मैने जो सोचा यह था स्केचिंग ।स्केचिंग में बहुत कुछ आता है, लेकिन मैंने उसमें से सिर्फ पोर्टरेट पर फोकस किया और उसी पर काम किया।
3-रिसर्च सिर्फ उतनी ही करो जितनी तुम्हें जरुरत हो- स्किल में किया गया अभ्यास रिजल्ट देगा। लेखक दो समूहों के उदाहरण देते हैं ।जिसमें से पहले समूह को लर्निंग बाई डूइंग से पॉट बनाना सीखने को कहा गया दूसरे समूह को किताबें दी गयी और फ़िर पॉट बनवाये गये।रिजल्ट यह रहा कि पहला समूह ज्यादा अच्छे और अधिक संख्या में पॉट बना पाया। मेरे पास कोई मेंटर नहीं था तो मैंने यू टयूब की मदद से थोड़ा बहुत वीडियोज़ देखे और अपना काम शुरू कर दिया।
4-रुकावटों को दूर करना-
यदि 40 मिनट भी समय एक दिन में दें तो 1 महीने में 20 घण्टे का समय हो जाता है ।इस 40 मिनट के दौरान tv ,फोन अन्य किसी भी ऐसी चीज से दूर रहना है जो हमारे फोकस को कम करे।कोशिश ऐसी करें जिससे हमें थकावट महसूस ना हो।जब मैं काम कर रही थी तो कभी पूरा समय नहीं दे पायी तो 20 या 30 मिनट जरुर काम किया,पर लगभग हर दिन अभ्यास किया।
5- 20 घंटे का अभ्यास -
इस काम को 20 घंटे का समय देना है। जब 20 घंटे अभ्यास के लिए तैयार होते हैं तो हम सोचते हैं कि यदि यह काम होगा तो हम इसको सीख जाएंगे या फिर हमें लगता है कि यह इतना जरुरी नही हैं कि हम इस काम को 20 घंटे का समय दें।इसका मतलब यह काम हमारे लिए इतना जरूरी नहीं है ।इस तरीके से हम यह भी जान सकते हैं कि कौन से हमारे रियल ड्रीम्स हैं, जिन्हें हासिल करना चाहते हैं और कौन से ऐसे हैं जो सिर्फ हम सोचते हैं कि अगर यह सीख दिया होता तो अच्छा होता। 20 घंटे देने के बाद मुझे थोड़ा सा विश्वास आया है कि हां मैं कर सकती हूं। मुझे लगता है कि यह सिर्फ एक शुरुआती बिन्दु है। इसके बाद एक लंबा सफर शुरू होता है। लेकिन यह निश्चित रूप से काम करता है। जब मैं पहले दिन और आज मैं देखती हूं तो मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा है । 20 घंटे में मैने अलग-अलग जैसे बन पाये पोर्टरेट बनाए ।अन्तिम 20 वें घण्टे में जब मैने अभ्यास किया तो मैंने उस महिला की शक्ल बनाई जिसको पहाड़ की बेटी नाम से जानते हैं ,भारत की पहली महिला जिन्होंने एवरेस्ट फतह किया बछेन्द्री पाल!
मैं परफ़ेक्ट नहीं हूँ, एक यात्रा पर हूँ जिसका आनन्द ले रही हूँ और आपके साथ साझा कर रही हूँ।
Friday, May 15, 2020
ऑनलाइन शिक्षा::कुछ दबे से सवाल
जहाँ पूरे देश में लॉक डाउन के कारण अप्रैल से नये शिक्षा सत्र में बच्चे स्कूल नही जा पा रहे वहीं आज पहली प्राथमिकता दैनिक जरूरतों को पूरा करना है और पड़ोस के घरों में फोन पर ऑनलाइन काम आता होगा तो बच्चों की मांग उठना स्वाभाविक ही है हमें भी फोन चाहिए, चाहे वह परिवार कल की राशन पानी की जुगत में लगा हो।
कुछ बच्चे जिनके लिए गुरुजनों का आदेश सर्वोपरी होता है। सुबह से शाम तक पूरा दिन उस काम को उतारने में लगे हैं जिसकी उनको एक लाइन तक समझ नहीं आ रही।एक बच्ची अपनी मां के पास आकर शाम को हाथ दबवाती है ,आज पूरे दिन 40 पेज लिखे माँ हाथ दर्द हो गया।
बाल केंद्रित शिक्षा, जीवन के लिए शिक्षा किन-किन सिद्धांतों को लेकर हम शिक्षा को देने की बात करते हैं जहां एक और पूरा विश्व महामारी से जूझ रहा है, एक ऐसा जीव मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरा बना हुआ है जो दिखाई तक नहीं देता। प्रकृति मनुष्य को उसके अस्तित्व के असली रूप का परिचय दे रही है और हमने बच्चों को आज भी उन्हें कागजों के ढेर में दबा कर रखा हुआ है। कुछ स्कूलो के बच्चे कंप्यूटर स्क्रीन के सामने स्कूल ड्रेस में बन्द कमरे में बैठे पढ़ रहे हैं न शारीरिक स्वास्थ्य है न मानसिक स्वस्थ्य कैसी शिक्षा है ये?
हमें एक शिक्षक को पुनः विचार करने की आवश्यकता है कि आखिर हम शिक्षा दें किसके लिए रहे हैं । अप्रैल-मई का सिलेबस हम फोन पर उतरवाकर ही पूरा करना चाह रहे हैं। हमारी प्राथमिकता क्या है? बच्चा या पाठ्यक्रम??
समान शिक्षा समान अवसर उनके लिए कहाँ है जो प्रश्न सुबह-सुबह आज पूछा गया।शिक्षक की भूमिका सहयात्री के रूप में हो,प्रकृति आज पूरी दुनिया के लिए प्रत्यक्ष आदर्श शिक्षक के रूप में प्रकट हुई है।
हमारा दायित्व बनता है कि हम साथ-साथ सीखते हुए बच्चों का साथ दें। दिया जाने वाला काम फोन की स्क्रीन के सामने बैठने वाला ना होकर कुछ ऐसा हो कि वह अपनी मां द्वारा जंगल से लायी गयी घास की पत्तियों के प्रकार देखें। वह गाय को घास खाते देखे जुगाली लगाते देखें।घर पर बनने वाला भोजन कितनी मेहनत से बनता है ,घर पर कितना लीटर पानी लगता है?
मेरी मां सारा दिन कितने किलोमीटर चलती है?मेरी दादी को कितनी कहानियां आती हैं? मेरे दादाजी लोगों के मकान कैसे बनाते हैं? हल कैसे लगाते हैं? मिट्टी के रंग देखो । मिट्टी की बनावट देखो ।देखो इस महामारी में अपने परिवार अपने गांव की समस्याएं ।जो लोग आगे आ रहे उनकी भूमिकाएं। उन सबके बीच बच्चे अपने जीवन अस्तित्व और पर्यावरण में आपसी तालमेल और प्रकृति का सम्मान सीखें।
ऐसा कौन सा विषय है जो बच्चा इस समय नहीं सकता। सच्ची शिक्षा नहीं ले सकता। यह तभी संभव हो शायद जब बच्चे को मोबाइल स्क्रीन और उसको कागज के टुकड़ों पर उतारने से फुर्सत मिल पाए। शिक्षक को दुश्मन की तरह दिख रहा है जो सारा दिन उसको एक बोझ तले दबाये हुए हैं।इसे ऐसे अवसर के रूप में देखा जाए, जहां छात्र और शिक्षक जीवन से जो कुछ भी सीख रहे हैं, उसको समूह में साझा करें। बालक है तो हमारी शिक्षा है। आओ एक बार उसके लिए विचार करें।
आज हम सभी इस एक नई समस्या से जूझ रहे हैं कमेंट कर अपने विचार जरुर दें जिससे हम सभी मिलकर एक निष्कर्ष तक पहुँच पायें।
Saturday, May 2, 2020
भारतीय संविधान और आजीविका का अधिकार :व्याख्यान सुदर्शन ठाकुर
2)पहुँच-
कहां तक आदमी कितनी योजनाओं के लाभ ले सकता है?
3)क्षमता-उसकी अपनी क्षमताएं क्या हैं?
4)अभिवृति-
उसकी सोच कैसी है? जैसे उसके पास खेत हैं पर खेती करना पसंद नही।
5)आश्ववासन -
उसको भरोसा होना चाहिए कि जो भी उत्पादन हो उसका बाजारीकरण हो पाएगा या फिर कोई नुकसान होने पर मुआवजे की व्यवस्था होगी।
प्रदान संस्था के बारे में वे बताते हैं की यह 7 राज्यों में कार्य कर रही है और स्थानीय जरूरतों के अनुसार प्राथमिकताएं तय की जाती हैं।
Friday, April 24, 2020
विश्व पुस्तक दिवस::बातें किताबों की
आज सुबह-सुबह एक पुस्तक का सारांश बच्चों के साथ ऑनलाइन साझा किया।उनको जो बात पुस्तक में अच्छी लगे वह बताने के लिए कहा उसके बाद सौरव का जवाब कुछ ऐसा था-
शुरुआत की 14 पंक्तियाँ उसकी अपनी थी बिल्कुल अपने मन के भाव। इसमें भाषाई त्रुटि के साथ-साथ अशुद्ध वर्तनी है, सच है। लेकिन उसके सपनों ने जो उड़ान भरी है,वह उसकी भावों से स्पष्ट थी। यह एक पुस्तक की ताकत है,जो बच्चे के विचारों में यह आत्मविश्वास ला पाया कि बच्चा अपने अवलोकन को यह शब्द दे पाया।शायद अपने भविष्य के लिए एक सोच.......।शाम 5:00 बजे अजीम प्रेमजी फाउंडेशन रुद्रप्रयाग की तरफ से पिथौरागढ़ के शिक्षक तथा कवि महेश पुनेठा जी का ऑनलाइन व्याख्यान आयोजित किया गया था।जिसमें पूरे प्रदेश भर से शिक्षक जुडे थे। पुनेठा जी अपने दीवार पत्रिका अभियान, शैक्षिक सरोकारों को समर्पित पत्रिका शैक्षिक' दखल 'के संपादन और अपने लेखों, कविताओं ,अपनी पुस्तक' शिक्षा के सवाल' द्वारा हम सबके बीच एक परिचित हस्ती हैं। उनका व्याख्यान शुरू हुआ और उन्होंने अपने जीवन से शुरू करते हुए पुस्तकों को अपनी संस्कृति में शामिल बताया। कुछ ऐसा कैसे हो की पुस्तकें हमारी आदतों में शुमार हो जाए।अपने जीवन के अनुभवों से बताते हैं कि जब मैं पुस्तकों का अध्ययन नहीं करता था तो मैं बच्चों को पढ़ाता था किंतु पुस्तकों के अध्ययन के बाद मैं बच्चों को पढ़ने लगा,अध्ययन ने यह दृष्टिकोण दिया। एक शिक्षक के लिए आवश्यक है कि उन्हें बाल मन की समझ हो, शिक्षा की समझ हो कि आखिर शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या रोजगार पाना, परीक्षा पास करना या इससे भी कहीं अधिक कुछ और है?? इसके अलावा शिक्षक का कल्पनाशील होना बेहद जरूरी है और इन सभी गुणों का विकास अध्ययन के द्वारा संभव है। अध्ययन से एक दर्शन से मिलता है, जो जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाने का काम करता है। उन्होंने अपनी बातचीत में कुछ लेखकों का जिक्र किया जैसे जान होल्ड, ए एस नील।नील का नाम सुनते ही मैं उनके विद्यालय जा पहुंची 'समरहिल' अनोखे प्रयोग हुए थे वहां ।यह पुस्तक मुझे अजीम प्रेमजी फाउंडेशन रुद्रप्रयाग से पढ़ने को मिली थी। उसको पढ़ने के बाद तो मैं दो या तीन बार सपने में उस विद्यालय जा चुकी हूँ। पुनेठा जी की बात आगे बढाते है और शिक्षा के एक अवधारणा को स्पष्ट करते हुए समझाते हैं, किस प्रकार ज्ञान सृजन पहले चरण अवलोकन से आगे बढ़ता है। अवलोकन प्रत्यक्ष भी होता है और जहां हमारी पहुंच नहीं होती वहां पुस्तकें हैं जिनके माध्यम से हम वहां अवलोकन कर सकते हैं। इस प्रकार ज्ञान की प्रक्रिया का चरण आगे बढ़ते हैं और एक आलोचनात्मक विवेक का विकास होता है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ पुस्तकों की उपलब्धता से पढ़ने की संस्कृति विकसित की जा सकती है। अपने अनुभव बताते हैं कि इसके लिए हमें तात्कालिक उद्देश्य छात्रों के सामने देने होंगे। जिससे बच्चों के अंदर रुचि जिज्ञासा उत्पन्न हो सके जैसे दीवार पत्रिका में बच्चे लिखने के लिए पढ़ना शुरू करते हैं और धीरे-धीरे पढ़ना उनकी आदत में शुमार हो जाता है ।
मुझे ध्यान आया जब कक्षा 8 में मैने बच्चों को कवि चंद्रकुवँर बर्त्वाल पर नाटक बनाने के लिए बोला था तो कैसे साहिल दौड़कर मेरे कमरे से जीवनी पर लिखी पुस्तक उठा लाया था । सारे कक्षा के बच्चे उस पुस्तक पर झपट पड़े थे। जिसके लिए फिर मुझे समूह बनाने पड़े, यह तात्कालिक उद्देश्य का ही परिणाम था। उनको नाटक प्रस्तुत करना था तो पढ़ना बहुत जरूरी हो गया था। इसके लिए वे इतने उत्सुक दिख रहे थे।
पुनेठा जी आगे बताते हैं कि रुचि विकसित करने के लिए पुस्तकालयों को गतिविधि केंद्र बनाना होगा।कक्षा शिक्षण के दौरान पुस्तकों पर चर्चा ,पुस्तक में कोई रोचक किस्सा साझा करने से निश्चित रूप से छात्रों में पुस्तकों के लिए आकर्षण बढ़ता है।
अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से रिचा जी, सोनिया जी और करन जी द्वारा मुझे इस मीटिंग की जानकारी प्राप्त हुई थी इसके लिए मैं इन साथियों का और रुद्रप्रयाग APF केंद्र का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूं।
Tuesday, April 21, 2020
भारत का संविधान और स्त्री पुरुष समानता के प्रश्न::कमला भसीन
रुद्रप्रयाग में झमाझम बारिश के बीच कमला भसीन को सुनना बहुत ही रोचक अनुभव था। सबसे पहले कमला जी द्वारा भारतीय संविधान की विशेषताओं और संघर्षपूर्ण जीवन से उच्च पद पर पहुंचने की अंबेडकर जी की जीवन यात्रा और योगदान के बारे में बताया। समाज में नारी तथा संविधान उनके अधिकारों के बारे में बातचीत करती हैं। शुरुआत अपने घर से करती हैं और बताती हैं कि कैसे पुरुषसत्ता घर-घर में विद्यमान है। हम समाज की बात तो बाद में करें, किस प्रकार से गुस्सा करना ,हाथ चलाने का अधिकार पिता का होता है। बड़े-बड़े निर्णय पर अधिकार पिता का ही होता है ।घर का बंटवारा होता है तो भाइयों के बीच और बेटी का कन्यादान कर दिया जाता है। क्या कन्या कोई गाय बकरी या वस्तु है ?हमारा संविधान हर नागरिक को जन्म से स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यह सच है कितने लोगों ने संविधान को पढ़ा है और अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझने की कोशिश की है। कितने परिवारों ने अपने बच्चों को संविधान पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया है? उनका एक प्रश्न वाकई हमारे सामने था ।उन्होंने इस तरफ भी इशारा किया सबसे ज्यादा किस प्रकार असमानता,हिंसा शिक्षित समाज में अधिक पाई गई है।शिक्षा डिग्री नहीं है तो शिक्षा वह है जो हमें सोचने की आजादी दे।उन्होंने बताया कि विश्व की आधी जनसंख्या जो कि नारी है कितने कम प्रतिशत में शीर्ष पदों पर कार्य कर रही है यह भारत में ही नहीं विश्वव्यापी समस्या है ।इन सभी बातों को समझ में लाने की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी घर परिवार के साथ-साथ शिक्षकों की भी बन जाती है।
इसको उन्होंने इसको उन्होंने इस प्रकार से बताया कि सेक्स शारीरिक है यानी ऐसा फर्क जो औरत और मर्द के जननांगों में और उनसे जुड़े कार्यों में दिखाई देता है। यह प्रकृति के देन है।जिसको बदला नहीं जा सकता।जेंडर सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था है, जो मनुष्य ने बनाई है कि स्त्री कैसे व्यवहार करेगी पुरुष कैसे, इनकी भूमिका है क्या होंगी। जेंडर बदला जा सकता है क्योंकि यह समाज ने निर्धारित किया है।यह मनुष्य ने बनाया है। उन्होंने उत्तराखंड राज्य के निर्माण में उत्तराखंड की महिलाओं के महत्वपूर्ण योगदान का भी जिक्र किया।
विद्यालयों में कितनी बार हम जाने-अनजाने जेंडर को लेकर भूमिकाएं निर्धारित करते हैं और यह चलता ही जाता है। स्वागत, स्वागत में प्रार्थना में लड़कियों को आगे रखना, हमारे बुलाने का तरीका 2 लड़के और 2 लड़कियां आओ।भारी काम हो तो लड़के आओ जबकि घर पर घास का बोझ लडकियां ही उठाती हैं।इन असमानताओं को दूर करने के एक शिक्षक के रूप में विद्यालयों में हमें कितने अवसर मिलते हैं।ऐसे अनेक सवालों के साथ दिल्ली से उत्तराखंड के सुदूर पहाडियों तक पहुँचती यह बुलंद आवाज हमें उद्वेलित कर गयी।